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बीसी का जाना एक युग का अंत

उत्तराखंड की राजनीति के शिखर पुरुष बी सी खंडूड़ी हमारे बीच नहीं रहे। उनके साथ ही एक युग का अंत हो गया है। उनके जाने से जो रिक्तता उभरी है, वह कभी भर नहीं पाएगी। दरअसल उनके साथ ही राजनीति का वह अध्याय भी खत्म हो गया है जिसमें विकास के साथ अनुशासन, कर्मठता, पराक्रम, शुचिता, पारदर्शिता और उच्च मूल्यों को वरीयता दी जाती थी। उनका जाना निसंदेह राष्ट्र की अपूरणीय क्षति है। वर्ष 1934 में देहरादून में जन्में खंडूड़ी की उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हुई और सैन्य अभियांत्रिकी महाविद्यालय पुणे तथा इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स, नई दिल्ली और रक्षा प्रबंध संस्थान सिकन्दराबाद से डिग्री प्राप्त करने के साथ उन्होंने भारतीय सेना को अपनी उल्लेखनीय सेवाएं दीं। वर्ष 1954 से 1990 तक भारतीय सेना की कोर ऑफ इंजीनियर्स में उल्लेखनीय सेवा के लिए वर्ष 1982 में राष्ट्रपति ने उन्हें अति विशिष्ट सेवा मैडल प्रदान किया गया।
वर्ष 1991 में सेवानिवृत्ति के बाद उनका राजनीति में पदार्पण हुआ और 1996 के चुनाव को छोड़ कर वर्ष 2007 तक लगातार सांसद रहे। वर्ष 2014 में वे फिर लोकसभा के लिए चुने गए और वर्ष 2019 तक इस पद पर रहे। वर्ष 2019 में उनके स्थान पर भाजपा ने तीरथ सिंह रावत को गढ़वाल लोकसभा सीट से टिकट दिया तो तब अटकलों का दौर चला कि खंडूड़ी शायद राज्यपाल बनाए जाएंगे लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और एक तरह से वे सक्रिय राजनीति से अलग हो गए। पिछले कुछ समय से बढ़ती उम्र और अस्वस्थता के कारण वे एक तरह से नेपथ्य में ही थे लेकिन उनकी मौजूदगी ही उनके प्रशंसकों को संबल देती थी।
इससे पहली बड़ी परिघटना वर्ष 2007 में उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव में घटी थी जब स्पष्ट बहुमत न होने के बावजूद खंडूड़ी के नेतृत्व में भाजपा ने सरकार बनाई और कड़े अनुशासन और विकास का एक ऐसा मॉडल दिया जो अर्से तक याद रहेगा। तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद खंडूड़ी ने सरकार चलाई लेकिन वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रदेश की पांचों सीटें हार गई तो उन्हें हटाने के लिए अभियान तेज हुआ। यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि खंडूड़ी को उत्तराखंड की सत्ता से बेदखल करने के लिए पार्टी में ही भितरघात हुआ और नतीजा पांचों सीटें हारने के रूप में सामने आया। वरना कम से कम गढ़वाल लोकसभा सीट तो भाजपा जीत ही सकती थी।
बहरहाल खंडूड़ी सत्ता से बेदखल हुए तो राजनीति ने करवट बदली लेकिन बढ़ती अलोकप्रियता के कारण 2012 के विधानसभा चुनाव से ठीक 11 महीने पहले एक बार फिर भाजपा ने डैमेज कंट्रोल के लिए खंडूड़ी की ताजपोशी की और नारा दिया “खंडूड़ी हैं जरूरी”। किंतु यह नारा कारगर नहीं रहा। खुद खंडूड़ी कोटद्वार से चुनाव हार बैठे। यह अलग बात है कि उसमें भी कई लोगों का योगदान रहा और अंततः वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में खंडूड़ी जी की बेटी ऋतु भूषण खंडूड़ी ने कोटद्वार सीट से चुनाव जीत कर उस पराजय का हिसाब बराबर किया। पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में उनका राजनीति में पदार्पण हुआ तो उन्होंने उच्च मानदंड स्थापित कर एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया। सैन्य जीवन से लेकर अपनी राजनीतिक पारी में उनका व्यक्तित्व राष्ट्रहित और जनसेवा के प्रति समर्पित रहा। यह अपने आप में विलक्षण बात है। स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के जरिए भारत को एक सूत्र में बांधने का मंत्र उन्होंने ही दिया था। आज देश में एक से बढ़ कर एक हाईवे दिख रहे हैं तो यह उनकी ही दूरदृष्टि का विस्तार है। उत्तर को दक्षिण से और पूरब को पश्चिम से जोड़ने के लिए स्वर्णिम चतुर्भुज की योजना उन्होंने ऐसे समय में क्रियान्वित की, जब सरकारें अनिश्चितता के भंवर में झूलती रहती थी और संसाधनों का सर्वथा अभाव था। राष्ट्र के पास था तो सिर्फ हौसला और विजन। उसी विजन से खंडूड़ी ने चारों दिशाओं को जोड़ा।
इस तरह मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी ने अपने संपूर्ण राजनीतिक जीवन में उत्तराखंड के विकास, सुशासन, पारदर्शिता और ईमानदार कार्यशैली से ऐसी पहचान बनाई, जो एक विशिष्ट उदाहरण है। यानी खंडूड़ी एक ऐसी लकीर खींच गए हैं कि उसे छोटा करना किसी के बूते में फिलहाल तो दूर दूर तक नहीं दिखता। जननेता के रूप में उन्होंने उत्तराखंड के विकास के लिए अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लिए और अपनी सादगी, स्पष्टवादिता एवं कार्यकुशलता से आम जनता के हृदय में विशेष स्थान बनाया। यह अलग बात है कि बाद की सरकारों ने उनके संकल्प को तरजीह नहीं दी, इस कारण कई सारे काम आज भी अधूरे ही हैं।
इसमें दो राय नहीं हो सकती कि खंडूड़ी को मुख्यमंत्री के रूप में उनकी बेदाग छवि के चलते प्रदेश में सशक्त भू कानून व लोकायुक्त के गठन के अलावा राजनीति में स्वच्छ छवि व सुशासन के लिए आदर और सम्मान के साथ याद किया जाएगा। यह अलग बात है कि उनके द्वारा संशोधित भू कानून में बाद की सरकारों ने इतने छेद किए कि प्रदेश में जमीनों की बेतहाशा लूट से सारे पहाड़ बिक गए और पहाड़ी हाथ मलते रह गए यह प्रसंग फिर कभी।
सच तो यह है कि सदियों में ऐसे लोग जन्म लेते हैं जो अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से निशान छोड़ जाते हैं। ऐसे कुशल सैन्य अधिकारी और बेदाग राजनीति के शिखर पुरुष को विनम्र श्रद्धांजलि। ॐ शांति।।

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