सिस्टम पर भारी ‘रेडीमेड पी-एच. डी.’ डॉ. सुशील उपाध्याय

देहरादून 13 जून। उच्च शिक्षा के नियोजन, प्रबंधन और नीति-निर्माण से जुड़े प्रायः सभी लोगों को यह पता है कि निजी क्षेत्र के कुछ विश्वविद्यालय पीएचडी जैसी उपाधियों को कितने संदिग्ध तरीके से उपलब्ध करा रहे हैं। अब प्रश्न समस्या पर विमर्श का नहीं है, बल्कि चुनौती यह है कि इसका समाधान क्या हो। इसके लिए तीन स्तरों पर तत्काल निर्णायक कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। ये कदम सरकार, यूजीसी और इसी कड़ी में सभी विश्वविद्यालयों के स्तर पर उठाए जाने होंगे। इनमें से अधिकांश ऐसे हैं, जिन पर सरकार, यूजीसी अथवा विश्वविद्यालयों को नाममात्र का खर्च करना होगा।
विगत वर्षों में यूजीसी ने पीएचडी को लेकर जो रेगुलेशन जारी किए हैं, उनमें कई ऐसे आधे-अधूरे प्रावधान शामिल हैं, जिनके जरिए निजी क्षेत्र के विश्वविद्यालय (यहां उन निजी विश्वविद्यालयों की बात नहीं हो रही है जिन्होंने अपने मानकों और परिचालन को उच्च स्तर का बनाए रखा है) पीएचडी जैसी उपाधि के लिए चोर दरवाजों का निर्धारण कर देते हैं। अब, यूजीसी को और इसी क्रम में राज्य सरकारों को यह व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए कि भविष्य में पीएचडी उपाधि में जो भी प्रवेश दिए जाएं, वे यूजीसी, सीएसआईआर, आईसीएआर अथवा राज्यों द्वारा संचालित सेट/स्लेट परीक्षा में सफल होने वाले युवाओं को ही दिए जाएं। इन सभी परीक्षाओं में हर साल लगभग डेढ़ लाख से अधिक युवा सफल होते हैं, जबकि पूरे देश में प्रतिवर्ष पीएचडी में पंजीकृत होने वालों की संख्या औसत रूप में 50 से 55 हजार के बीच होती है।
यूजीसी ने अपने रेगुलेशन में यह व्यवस्था की हुई है कि सभी विश्वविद्यालय अपनी प्रवेश परीक्षा के जरिए भी पीएचडी में 50 फीसद प्रवेश दे सकते हैं। यहीं से बैकडेट में पंजीकरण जैसे अनियमितता की आशंका पैदा होती है। नेट या सेट/स्लेट की अनिवार्यता से काफी हद तक अपात्र लोगों के पीएचडी में पंजीकरण पर रोक लग सकती है।
दूसरा कार्य यूजीसी को यह करना चाहिए कि जिन निजी विश्वविद्यालयों को अभी तक यूजीसी का 2(f) प्रमाणपत्र प्राप्त न हुआ हो, उन्हें पीएचडी उपाधि आरंभ करने की अनुमति न दी जाए। ऐसे अनेक विश्वविद्यालय हैं जो अपनी स्थापना के तत्काल बाद पीएचडी कार्यक्रम की घोषणा करते हैं और पंजीकरण आरंभ कर देते हैं। गौरतलब है कि किसी भी नए विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर विभागों एवं शोध केंद्रों के विकसित होने में समय लगता है। अतः तत्काल पीएचडी की बजाय न्यूनतम पांच वर्ष का कूलिंग पीरियड निर्धारित किया जाए। अर्थात कोई भी विश्वविद्यालय तभी पीएचडी आरंभ करने का पात्र हो, जब उसकी स्थापना को पांच वर्ष पूरे हो चुके हों और साथ ही उसे 2(f) का प्रमाणपत्र प्राप्त हो गया हो। यह व्यवस्था भी कुछ हद तक शोध क्षेत्र के फर्जीवाड़े पर रोक लगाएगी।
निजी क्षेत्र के कई विश्वविद्यालयों में नियमित (पूर्णकालिक) शिक्षक नियुक्त नहीं हैं, जबकि वहां पीएचडी उपाधि में लगातार प्रवेश का क्रम जारी है। ऐसे मामलों में एक अच्छी प्रक्रिया यह हो सकती है कि सभी निजी विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और सहायक प्रोफेसर के रूप में नियुक्त शिक्षकों का विवरण एक राष्ट्रीय पोर्टल पर दर्ज होना चाहिए, ताकि इसे कोई भी सरकारी प्राधिकारी, अभिभावक अथवा शोधार्थी आसानी से उनका विवरण देख सके। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश (नवंबर, 2025) के बाद देशभर के निजी एवं डीम्ड विश्वविद्यालयों के ऑडिट और न्यूनतम मानकों की जांच की प्रक्रिया प्रारंभ हुई है। न्यायालय ने केंद्र सरकार, राज्य सरकारों तथा यूजीसी से इस संबंध में विस्तृत हलफनामे भी मांगे हैं। उम्मीद है कि इससे कुछ सकारात्मक बदलाव आएगा।
इसके साथ ही, भारत सरकार को यूजीसी तथा राज्य सरकारों के माध्यम से एक ऐसा पोर्टल संचालित करना चाहिए, जिस पर सहायक प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर बनने के पात्र शिक्षकों का पूरा विवरण उपलब्ध हो। निजी विश्वविद्यालयों के लिए यह बाध्यकारी होना चाहिए कि जिस भी शिक्षक की नियुक्ति की जाए, उसे इसी पोर्टल के माध्यम से लिया जाए। इससे यह पता चल सकेगा कि वास्तव में संबंधित विश्वविद्यालय द्वारा प्रोफेसरों की नियुक्ति की भी गई है अथवा नहीं। कुछ वर्ष पहले यूजीसी ने नेट उत्तीर्ण युवाओं के लिए एक पोर्टल आरंभ किया था और उच्च शिक्षण संस्थानों से यह अपेक्षा जताई थी कि वे इस पोर्टल के माध्यम से सुयोग्य शिक्षकों की नियुक्ति कर सकेंगे, लेकिन यह पोर्टल अधिक समय तक नहीं चल पाया। अब इसे और व्यापक स्तर पर पुनः आरंभ करने की आवश्यकता है।
उल्लेखनीय है कि शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर ऐसा ही भ्रष्टाचार पूर्व में कुछ निजी मेडिकल कॉलेजों में भी रहा। इसके बाद मेडिकल शिक्षा के नियामकों द्वारा फैकल्टी की दोहरी नियुक्तियों (Ghost Faculty) पर रोक लगाने के लिए केंद्रीय डिजिटल रिकॉर्ड एवं सत्यापन प्रणालियां विकसित की गईं। इससे काफी हद तक इस पर नियंत्रण स्थापित हुआ कि एक ही प्रोफेसर को एक से अधिक मेडिकल कॉलेजों में नियुक्त दिखाया जा सके अथवा बिना पर्याप्त फैकल्टी के ही शिक्षण कार्य संचालित किया जा सके।
इस कड़ी में एक और उल्लेखनीय पहल की जा सकती है, हालांकि इस पहल पर बहुत सारे शिक्षकों की ओर से ऐतराज आएगा। इसके तहत, शोध क्षेत्र में गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए रिसर्च गाइड हेतु एक लाइसेंस व्यवस्था लागू किए जाने पर विचार किया जाए। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा प्रत्येक वर्ष आयोजित की जाए। पीएचडी उपाधिधारी जो भी शिक्षक शोध निर्देशन करना चाहते हैं, उन्हें इस परीक्षा को उत्तीर्ण करके अपनी योग्यता सिद्ध करनी चाहिए। यह व्यवस्था लागू हो जाए तो देश में शोध की गुणवत्ता पूरी तरह बदल जाएगी।
अभी तक की शोध व्यवस्था शोधार्थी और विश्वविद्यालयों के संसाधनों पर अधिक फोकस करती है, जबकि इस व्यवस्था से उन अकादमिक लोगों की गुणवत्ता भी सुनिश्चित होगी जो रिसर्च गाइड का दायित्व निभाने के इच्छुक हैं। यहां कुछ लोग यह सवाल उठा सकते हैं कि इतनी बड़ी संख्या में रिसर्च गाइड उपलब्ध कराना आसान नहीं होगा और इसके अभाव में विश्वविद्यालयों में शोध कार्य व्यापक रूप से प्रभावित हो जाएगा। लेकिन यदि प्रति गाइड औसतन 4 से 6 शोधार्थी मान लिए जाएं, तो देश में लगभग 11 से 12 हजार सक्रिय शोध-निर्देशकों की आवश्यकता होगी। देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में कार्यरत शिक्षकों की कुल संख्या की तुलना में यह संख्या अत्यंत सीमित है।
कई निजी विश्वविद्यालयों में ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जब पीएचडी प्राप्त करने के तत्काल बाद ही शिक्षक को रिसर्च गाइड बना दिया गया, जबकि सरकारी विश्वविद्यालयों में नए शिक्षकों को दो से पांच वर्ष तक की प्रतीक्षा करनी होती है। जब पीएचडी गाइडशिप के लिए राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा होगी, तो यह गड़बड़ी भी स्वतः ही दूर हो जाएगी।
इन तकनीकी बातों के बाद यह प्रश्न हमेशा मौजूद रहता है कि यदि उच्च शिक्षा के नीति-निर्णायक, जिनमें विशेष रूप से यूजीसी (जो अब नए उच्च शिक्षा नियामक आयोग के रूप में सामने आने जा रही है) तथा राज्य सरकारों के उच्च शिक्षा विभाग शामिल हैं, के हित निजी विश्वविद्यालयों के साथ जुड़े हों, तो फिर कोई भी बड़े से बड़ा समाधान निरर्थक ही होगा। यूजीसी और सरकार चाहें तो इन बिंदुओं पर भी विचार कर सकते हैं-
पीएचडी प्रवेश परीक्षा, साक्षात्कार, मेरिट सूची निर्गत करने आदि की वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य की जाए और अभिलेख कम से कम पांच वर्ष तक सुरक्षित रखे जाएं।
प्रत्येक शोधार्थी का पंजीकरण यूजीसी के केंद्रीय पोर्टल पर अनिवार्य किया जाए। बिना केंद्रीय पंजीकरण के किसी भी शोधार्थी की उपाधि को मान्य न किया जाए।
प्रत्येक छह माह की प्रगति रिपोर्ट तथा शोध निर्देशक और शोधार्थी की औपचारिक बैठकों का डिजिटल रिकॉर्ड यूजीसी पोर्टल पर अपलोड किया जाए। अभी तक यह रिकॉर्ड केवल विश्वविद्यालयों के पास रहता है।
बाह्य परीक्षकों का चयन विश्वविद्यालयों के बजाय यूजीसी अथवा राज्य स्तरीय डिजिटल पैनल से रैंडम तरीके से किया जाए।
शोध प्रबंध जमा करने से पूर्व प्लेजरिज्म जांच किसी स्वतंत्र सरकारी अथवा अधिकृत तृतीय पक्ष एजेंसी से कराई जाए।
शोध प्रबंध, प्लेजरिज्म रिपोर्ट, वाइवा की संस्तुति तथा शोधार्थी द्वारा प्रयुक्त डेटा, प्रश्नावली, फील्ड नोट्स और अन्य मूल सामग्री राष्ट्रीय डिजिटल रिपोजिटरी में सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जाए।
प्रत्येक विश्वविद्यालय में प्रतिवर्ष पीएचडी कार्यक्रम का स्वतंत्र अकादमिक ऑडिट कराया जाए। यूजीसी एवं राज्य सरकारें किसी विशेषज्ञ समिति के माध्यम से कम से कम 10 प्रतिशत पीएचडी उपाधियों का रैंडम सत्यापन करें।
जिन विश्वविद्यालयों में असामान्य रूप से बड़ी संख्या में पीएचडी उपाधियां प्रदान की जा रही हों, उनका विशेष ऑडिट अनिवार्य किया जाए।
शोध निर्देशक, विभागाध्यक्ष और कुलपति की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए तथा अनियमितता सिद्ध होने पर उन्हें व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी बनाया जाए।
पीएचडी कार्यक्रम संचालित करने की अनुमति प्रत्येक पांच वर्ष में पुनर्मूल्यांकन के आधार पर नवीनीकृत की जाए।
सभी निजी विश्वविद्यालयों के लिए शोधार्थी-निर्देशक अनुपात, शोध अवसंरचना और शोध निधि की न्यूनतम अनिवार्य शर्तों का कड़ाई से पालन कराया जाए। उल्लंघन की स्थिति में पीएचडी कार्यक्रम की मान्यता स्वतः निलंबित हो जाए।
शोध प्रबंध लेखन, थीसिस बिक्री अथवा ‘रेडीमेड पीएचडी’ सेवाएं उपलब्ध कराने वाले व्यक्तियों एवं एजेंसियों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई हेतु विशेष कानूनी प्रावधान बनाए जाएं।
पीएचडी प्रवेश से उपाधि प्रदान करने तक की पूरी प्रक्रिया को एकीकृत राष्ट्रीय डिजिटल ट्रैकिंग प्रणाली से जोड़ा जाए, ताकि किसी भी स्तर पर अभिलेखों में हेरफेर न हो सके।
डॉ. सुशील उपाध्याय
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