एक नयी शहरी रुपरेखा: शहरी चुनौती कोष भारत के शहरों को किस तरह दे सकता है नया रूप: श्रीनिवास कटिकिथला
नई दिल्ली 27 फ़रवरी । भारत के शहरीकरण का सफर निर्णायक मोड़ पर है। आज देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में शहरों का बड़ा योगदान है, ये देश के सबसे गतिशील आर्थिक केंद्रों का केंद्र हैं और लाखों लोगों के जीवन स्तर को लगातार प्रभावित कर रहे हैं। फिर भी, ये शहर बुनियादी ढांचे की कमी, जलवायु परिवर्तन के खतरे, वित्तीय बाधाओं और संस्थागत बिखराव जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। अब चुनौती यह नहीं है कि भारत का शहरीकरण होगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या भारत का शहरीकरण प्रभावी, टिकाऊ और समावेशी तरीके से हो पाएगा।
हाल ही में स्वीकृत शहरी चुनौती कोष (यूसीएफ) इस प्रश्न के उत्तर देने के भारत के नज़रिए में एक अहम बदलाव का प्रतीक है। वित्त वर्ष 2025-26 से वित्त वर्ष 2030-31 तक 1 लाख करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता राशि और करीब 4 लाख करोड़ रुपये के कुल निवेश को प्रेरित करने की अपेक्षित योजना के साथ, यह कोष पारंपरिक अनुदान-आधारित वित्तपोषण से हटकर, शहरी ढ़ांचागत विकास के लिए बाजार-आधारित, सुधार-संचालित और परिणाम पर आधारित ढांचे की ओर बदलाव का प्रतीक है।
अनुदान से बाजार अनुशासन की ओर
शहरी चुनौती कोष की संरचना उसे पूर्व के कार्यक्रमों से अलग करती है। केंद्रीय सहायता परियोजना लागत के 25 प्रतिशत तक सीमित है और शहरों को कम से कम 50 प्रतिशत राशि नगरपालिका बांड, बैंक ऋण या सार्वजनिक-निजी भागीदारी जैसे बाजार स्रोतों से जुटानी होगी। बाकी राशि राज्यों, शहरी स्थानीय निकायों या अन्य वित्तपोषण माध्यमों से आ सकती है।
यह आवश्यकता कार्यक्रम के मूल में वित्तीय अनुशासन को स्थापित करती है। यह संकेत देती है कि शहरी अवसंरचना अब केवल सार्वजनिक बजट पर निर्भर नहीं रह सकती, इसे राजस्व समर्थित परियोजनाओं के ज़रिए पूंजी बाजारों तक ज्यादा से ज्यादा पहुंच बनानी होगी। ऐसा करके, यह कोष ढ़ांचागत महत्वाकांक्षाओँ के साथ राजकोषीय संयम का तालमेल बिठाने की कोशिश करता है।
शहरी केंद्र की पुनर्कल्पना
यह कोष तीन विशिष्ट क्षेत्रों पर आधारित है, जो भारत के शहरी परिदृश्य की बदलती प्राथमिकताओं को दर्शाते हैं।
पहला क्षेत्र है विकास केंद्र के रूप में शहरों को देखना। इसके तहत यह माना जाता है कि शहरी क्षेत्र आर्थिक इंजन हैं। यह एकीकृत स्थानिक और पारगमन योजना, आर्थिक गलियारों के साथ अवसंरचना और औद्योगिक, पर्यटन या लॉजिस्टिक्स क्लस्टर जैसे मजबूत आर्थिक आधारों के विकास का समर्थन करता है। इसका मकसद केवल परिसंपत्तियों का निर्माण करना नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धात्मकता और उत्पादकता को भी बढ़ाना है।
दूसरा क्षेत्र, शहरों का रचनात्मक पुनर्विकास, भारतीय शहरीकरण की एक लंबे समय से चली आ रही चुनौती, ऐतिहासिक केंद्रों और केंद्रीय व्यावसायिक जिलों में भीड़भाड़ और गिरावट – का समाधान करता है। ब्राउनफील्ड पुनर्जनन, पारगमन आधारित विकास और सार्वजनिक भूमि के पुनर्गठन को प्रोत्साहित करके, यह कोष मौजूदा शहरी क्षेत्रों के भीतर मूल्यों को उजागर करने का प्रयास करता है। यह भूमि मूल्य अधिग्रहण और संरचित पुनर्विकास मॉडल के तर्क को पेश करता है, जिससे शहर सांस्कृतिक और विरासत चरित्र को संरक्षित करते हुए कम उपयोग वाली संपत्तियों को नवीनीकरण के चालक में बदला जा सकता है।
तीसरा क्षेत्र जल और स्वच्छता पर केंद्रित है, जहां सेवा संतृप्ति, अपशिष्ट जल पुन: उपयोग, बाढ़ शमन और विरासत अपशिष्ट स्थलों के उपचार पर जोर दिया जाता है। इस ढांचे में जलवायु में बदलाव समाहित है, यह मानते हुए कि चरम मौसम की घटनाएं और पर्यावरणीय तनाव शहरी भेद्यता को नया रूप दे रहे हैं।
छोटे शहरों को वित्तीय मुख्यधारा में लाना
शहरी चुनौती कोष के सबसे नवोन्मेषी तत्वों में से एक 5,000 करोड़ रुपए की ऋण चुकौती गारंटी योजना है। पहली बार, छोटे शहरी स्थानीय निकायों, खास तौर पर एक लाख से कम आबादी वाले, साथ ही पहाड़ी और पूर्वोत्तर राज्यों के शहरों, को संरचित केंद्रीय गारंटी के साथ बाजार वित्त तक पहुंच प्राप्त करने में सक्षम बनाया जा रहा है।
प्रारंभिक उधार को जोखिममुक्त करके, यह योजना छोटी नगरपालिकाओं के लिए प्रवेश संबंधी बाधाओं को कम करती है और ऋणदाताओं को विश्वास दिलाती है। ऐसा करके, यह शहरी स्थानीय निकायों को अंतर-सरकारी हस्तांतरणों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय, पूंजी बाजारों का लाभ उठाने में सक्षम विश्वसनीय वित्तीय संस्थाओं के रूप में दोबारा स्थापित करना शुरू करती है।
सुधार ही आधार
यूसीएफ के तहत केंद्रीय सहायता प्राप्त करना शासन, वित्तीय और नियोजन सुधारों पर निर्भर है। शहरों से अपेक्षा की जाती है कि वे साख में सुधार करें, परिसंपत्ति प्रबंधन प्रणालियों को मज़बूत करें, सेवा वितरण को डिजिटल बनाएं, परिचालन दक्षता बढ़ाएं और एकीकृत भूमि उपयोग तथा गतिशीलता नियोजन ढांचे अपनाएं।
वित्तपोषण लक्ष्यों और मापने योग्य नतीजों से जुड़ा है और लगातार सुधार बाद के संवितरणों के लिए एक पूर्व शर्त है। यह दृष्टिकोण यह दिशा में प्रयास करता है कि अवसंरचना निर्माण के साथ-साथ संस्थागत सुदृढ़ीकरण भी हो, जिससे कमजोर रखरखाव या कुप्रबंधन के कारण परिसंपत्तियों के क्षय का जोखिम कम हो।
शहरी चुनौती कोष शहरी विकास में निजी क्षेत्र की भूमिका को भी पुनर्परिभाषित करता है। बाजार वित्तपोषण को अनिवार्य बनाकर और संरचित जोखिम-साझाकरण व्यवस्थाओं को प्रोत्साहित करके, यह डिजाइन, वित्तपोषण और संचालन में निजी भागीदारी को और अधिक व्यापक बनाता है।
परियोजना तैयारी सहायता, लेनदेन सलाहकार सहायता और डिजिटल निगरानी प्रणालियों का मकसद परियोजना की व्यवहार्यता और निवेशकों के विश्वास को मजबूत करना है। अगर इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो यह भारत के नगरपालिका बांड बाजार को और बड़ा कर सकता है और शहरी अवसंरचना के लिए वित्तपोषण आधार को व्यापक बना सकता है।
सहयोगात्मक कार्यान्वयन मॉडल
आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय ने इस निधि को एक व्यापक हितधारक व्यवस्था के तहत रखा है। राज्यों, शहरी स्थानीय निकायों, वित्तीय संस्थानों, क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों और निजी विकासकर्ताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे एक प्रतिस्पर्धी, चुनौती-आधारित प्रक्रिया के ज़रिए इसमें शामिल हों, जो तत्परता और नवाचार को पुरस्कृत करती है।
राष्ट्रीय, राज्य और शहर स्तर पर क्षमता निर्माण के प्रावधान इस ढांचे में अंतर्निहित हैं, यह मानते हुए कि वित्तीय मदद तक पहुंच के साथ-साथ तकनीकी और प्रबंधकीय दक्षता भी ज़रुरी है। डिजिटल निगरानी प्लेटफॉर्म से पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ने और परिणाम-आधारित शासन को मज़बूत करने की अपेक्षा की जाती है।
भविष्य के लिए तैयार शहरों की राह
आगामी दशकों में भारत की शहरी आबादी में खासी वृद्धि होने वाली है और इसके साथ ही बुनियादी ढांचे की मांग भी बढ़ेगी। शहरी चुनौती कोष इसी दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखते हुए आर्थिक विकास, जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता और राजकोषीय स्थिरता को एक ही ढांचे में एकीकृत करने का प्रयास करता है।
आखिरकार क्या यह कोष भारत के शहरी विकास की दिशा बदल पाएगा, यह इसके क्रियान्वयन पर ही निर्भर करेगा। लेकिन इसका मकसद साफ है। शहरी चुनौती कोष शहरीकरण को एक वित्तीय बोझ के रूप में नहीं, बल्कि एक निवेश के अवसर के रूप में देखता है, जिसका लाभ उठाया जा सकता है। बाजार अनुशासन, सुधार प्रोत्साहन और मापने योग्य परिणामों को अपने डिजाइन में शामिल करके, यह भारत के शहरी परिवर्तन के अगले चरण को गति प्रदान करना चाहता है, एक ऐसा चरण जिसमें शहर सशक्त, प्रतिस्पर्धी और भविष्य के लिए तैयार विकास केंद्रों में विकसित हों।
लेखक आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के सचिव हैं।



