आईआईटी रुड़की ने विकसित किया स्मार्ट इलेक्ट्रॉनिक बैंडेज, शरीर की गतिविधियों से मिलेगी घाव भरने के लिए ऊर्जा
बिना बैटरी, तार और बाहरी ऊर्जा स्रोत के काम करने वाली 3D-MIDAS तकनीक, प्रयोगशाला व पशु परीक्षणों में मिले उत्साहजनक परिणाम
देहरादून,
11 सितंबर। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की (आईआईटी रुड़की) के शोधकर्ताओं ने इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी (आईएनएसटी), मोहाली के सहयोग से एक अभिनव स्मार्ट और स्व-संचालित इलेक्ट्रॉनिक बैंडेज विकसित किया है। यह बैंडेज शरीर की प्राकृतिक गतिविधियों से उत्पन्न यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत उत्तेजना में परिवर्तित करता है, जो घाव भरने की प्रक्रिया में सहायक हो सकती है। खास बात यह है कि इसके संचालन के लिए बैटरी, तार अथवा किसी बाहरी ऊर्जा स्रोत की आवश्यकता नहीं होती।
शोधकर्ताओं द्वारा विकसित इस तकनीक को 3D-MIDAS (3D Monolithic Integrated Dipolar-Ionic Fibrous Architectural Scaffold) नाम दिया गया है। इसे इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि शरीर के हिलने-डुलने, खिंचाव और अन्य प्राकृतिक गतिविधियों के दौरान उत्पन्न ऊर्जा का उपयोग कर विद्युत संकेत पैदा किए जा सकें। यानी शरीर की गतिविधियां ही बैंडेज के लिए ऊर्जा का स्रोत बनने में मदद करती हैं।
घाव भरने में प्राकृतिक विद्युत संकेतों की भूमिका
शोध के अनुसार घाव भरना एक जटिल जैविक प्रक्रिया है। त्वचा के क्षतिग्रस्त होने पर ऊतक की मरम्मत के दौरान कोशिकाओं को दिशा देने वाले प्राकृतिक विद्युत संकेत बाधित हो सकते हैं। 3D-MIDAS को घाव के स्थान पर नियंत्रित विद्युत उत्तेजना उपलब्ध कराने के साथ-साथ लचीली और वायु-संचार योग्य संरचना प्रदान करने के लिए विकसित किया गया है।
इसका रेशेदार स्कैफोल्ड अपनी मूल लंबाई के लगभग 800 प्रतिशत तक खिंच सकता है, जिससे यह शरीर की गतिविधियों के अनुरूप स्वयं को ढाल सकता है। इसकी छिद्रयुक्त संरचना घाव तक वायु के संचार और घाव से निकलने वाले द्रव के प्रबंधन में भी सहायता करती है।
यह तकनीक एकल त्रि-आयामी रेशेदार संरचना के भीतर विद्युत रूप से सक्रिय नैनोफाइबर तथा आयनिक रूप से प्रवाहकीय नेटवर्क को एकीकृत करती है। सामग्री के खिंचने पर ये दोनों घटक मिलकर विद्युत संकेत उत्पन्न करते हैं।
कोशिका प्रसार और प्रवासन में उल्लेखनीय सुधार
तकनीक का प्रयोगशाला और पशु अध्ययनों के माध्यम से मूल्यांकन किया गया है, जिसमें उत्साहजनक परिणाम सामने आए। प्रयोगशाला परीक्षणों में 3D-MIDAS ने नियंत्रण परिस्थितियों की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक कोशिका प्रसार और 2.5 गुना अधिक कोशिका प्रवासन प्रदर्शित किया। ये दोनों प्रक्रियाएं ऊतक की मरम्मत और घाव भरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
पशु अध्ययनों में 3D-MIDAS ड्रेसिंग से उपचारित घावों में 13 से 15 दिनों के भीतर लगभग 90 से 95 प्रतिशत तक घाव बंद होने की स्थिति देखी गई। इसके साथ ही नई रक्त वाहिकाओं के निर्माण में वृद्धि भी दर्ज की गई। हिस्टोलॉजिकल विश्लेषण में उपचारित घावों में ऊतक संरचना में सुधार और कोलेजन के अधिक जमाव के संकेत मिले।
चूहों की गतिविधियों से लगातार पैदा हुआ विद्युत आउटपुट
शोधकर्ताओं ने यह भी जांच की कि क्या यह ड्रेसिंग प्राकृतिक शारीरिक गतिविधियों से स्वयं विद्युत ऊर्जा उत्पन्न कर सकती है। स्वतंत्र रूप से गति करने वाले चूहों के घावों पर ड्रेसिंग लगाने के बाद पाया गया कि बिना किसी बाहरी यांत्रिक उत्तेजना के भी चूहों की गतिविधियों के दौरान लगातार विद्युत आउटपुट उत्पन्न हुआ।
उपकरण ने 500 बार खिंचाव चक्रों के दौरान स्थिर विद्युत प्रदर्शन किया। वहीं, दीर्घकालिक परीक्षणों में तीन महीने तक इसका प्रदर्शन स्थिर रहा। यह बार-बार होने वाले यांत्रिक खिंचाव को सहन करने की इसकी क्षमता को दर्शाता है। अध्ययन में कोशिका अनुकूलता, रक्त अनुकूलता, सूजन संबंधी प्रतिक्रियाओं और ऊतक पुनर्जनन का भी मूल्यांकन किया गया।
दूरस्थ स्वास्थ्य सेवाओं और आपदा परिस्थितियों में संभावित उपयोग
शोधकर्ताओं के अनुसार इस तकनीक की स्व-संचालित प्रकृति भविष्य में उन परिस्थितियों में उपयोगी हो सकती है, जहां बैटरी, तार या विद्युत उत्तेजना उपकरण साथ रखना कठिन हो। इसके संभावित उपयोग क्षेत्रों में दूरस्थ स्वास्थ्य सेवाएं, आपातकालीन एवं आपदा प्रतिक्रिया जैसी परिस्थितियां शामिल हैं।
हालांकि शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान अध्ययन में सैन्य उपयोग का मूल्यांकन नहीं किया गया है और अभी किसी रक्षा अनुप्रयोग की स्थापना नहीं हुई है। नियमित चिकित्सा उपयोग से पहले मानवों पर नैदानिक अध्ययन और आवश्यक सत्यापन किया जाना जरूरी होगा।
अंतर्विषयक शोध का परिणाम
आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो. के.के. पंत ने कहा कि इस अनुसंधान का वास्तविक महत्व समाज से जुड़ी महत्वपूर्ण स्वास्थ्य चुनौतियों के समाधान में योगदान देने की क्षमता में है। उन्होंने कहा कि उन्नत सामग्रियों और अंतर्विषयक अनुसंधान को व्यावहारिक स्वास्थ्य जरूरतों के समाधान की दिशा में केंद्रित करने का यह एक सशक्त उदाहरण है।
प्रधान अन्वेषक प्रो. कौशिक पारिदा ने कहा कि मौजूदा विद्युत-आधारित घाव भरने वाली प्रणालियों में बाहरी ऊर्जा स्रोत की आवश्यकता एक बड़ी सीमा है। 3D-MIDAS में शरीर की गतिविधियां ही विद्युत उत्तेजना उत्पन्न करने के लिए आवश्यक यांत्रिक ऊर्जा उपलब्ध कराती हैं। उन्होंने कहा कि यह तकनीक भविष्य में अधिक सुविधाजनक और स्व-संचालित घाव देखभाल प्रणालियों के विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।
इस शोध को Anusandhan National Research Foundation (ANRF), Indian Council of Medical Research (ICMR), Department of Science and Technology (DST) तथा Prime Minister’s Research Fellowship (PMRF) सहित भारत सरकार की प्रमुख अनुसंधान वित्तपोषण एजेंसियों और कार्यक्रमों से समर्थन मिला है।
शोध दल में आईआईटी रुड़की के Department of Polymer and Process Engineering तथा Center for Sustainable Energy से प्रो. कौशिक पारिदा और प्रथम लेखक विशु वर्मा, रोमि गर्ग, सायंती मल्लिक एवं अनीश अली तथा Institute of Nano Science and Technology (INST), मोहाली की Chemical Biology Unit से कनिका, जट्टिन कुमार एवं रेहान खान शामिल रहे।
यह अध्ययन पीयर-रिव्यूड जर्नल Nano Energy में “3D monolithic integrated dipolar-ionic fibrous scaffold for self-powered wound healing and exudate management” शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। यह शोध Volume 157 (2026), Article 112266 में प्रकाशित हुआ है। इसका DOI 10.1016/j.nanoen.2026.112266 है।