ईर्ष्या विष से भी भयंकर, मधुर वाणी ही श्रेष्ठ संस्कारों की पहचान : आचार्य शिवप्रसाद ममगांई

लैणी भिलंग 28 जून
। नागराज प्रांगण में धियाणियों द्वारा आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के तीसरे दिन प्रसिद्ध कथावाचक आचार्य शिवप्रसाद ममगांई ने कहा कि ईर्ष्या विष से भी अधिक घातक होती है। उन्होंने ध्रुव चरित्र का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि राजा उत्तानपाद की रानी सुरूचि ने ईर्ष्यावश ध्रुव को राजा की गोद में बैठने से रोक दिया, लेकिन भगवान की कृपा से ध्रुव को 36 हजार वर्ष तक राज्य करने का आशीर्वाद मिला। वहीं, ईर्ष्या का परिणाम यह हुआ कि सुरूचि के पुत्र उत्तम की यक्षों के हाथों मृत्यु हुई और स्वयं सुरूचि दावाग्नि में भस्म हो गई।
आचार्य ममगांई ने कहा कि जिस प्रकार सुगंध किसी श्रेष्ठ इत्र की पहचान होती है, उसी प्रकार मधुर और मर्यादित शब्द मनुष्य के श्रेष्ठ संस्कारों की पहचान होते हैं। मनुष्य के शब्द उसके संस्कारों और व्यक्तित्व का परिचय देते हैं। स्वभाव में विनम्रता, वाणी में मधुरता और कर्म में कर्तव्यनिष्ठा ही श्रेष्ठ जीवन के आधार हैं।
उन्होंने कहा कि शब्द ऐसी तलवार हैं जिनके घाव कई बार जीवन भर नहीं भरते। इसलिए सदैव मर्यादा में रहकर बोलना चाहिए, ताकि किसी को हमारे संस्कारों पर प्रश्न उठाने का अवसर न मिले। उन्होंने कहा कि कटु शब्दों का प्रयोग करने से बेहतर है कि व्यक्ति मौन रहना सीख ले।
कथा के दौरान आचार्य ममगांई ने अनेक प्रेरक प्रसंगों के माध्यम से श्रद्धालुओं को ईर्ष्या त्यागकर प्रेम, सद्भाव और सदाचार का मार्ग अपनाने का संदेश दिया। उनके ओजस्वी प्रवचनों से उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।
इस अवसर पर डॉ. रामकृष्ण भट्ट, सरस्वती भट्ट, संगीता नौटियाल, आचार्य द्वारिका पैन्यूली, डॉ. आचार्य जगदंबा प्रसाद पैन्यूली, सूर्य मणि पैन्यूली, सुंदर लाल उनियाल, देवी प्रसाद पैन्यूली सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं युवा मंगल दल के सदस्य उपस्थित रहे।
