भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की ने विकसित किया 10-किलोमीटर रेज़ोल्यूशन वाला जलवायु प्रक्षेपण डेटासेट
‘इंड्रा-सीएमआईपी6’ से भारत और दक्षिण एशिया में जलवायु जोखिम आकलन और आपदा तैयारी को मिलेगा नया आधार
रुड़की,15 मई। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की के शोधकर्ताओं ने भारतीय उपमहाद्वीप के लिए “इंड्रा-सीएमआईपी6” नामक एक उच्च-रेज़ोल्यूशन ओपन-एक्सेस जलवायु प्रक्षेपण डेटासेट विकसित किया है। यह डेटासेट ऐतिहासिक और भविष्य की जलवायु परिस्थितियों के तहत लगभग 10 किलोमीटर स्थानिक रेज़ोल्यूशन पर दैनिक वर्षा और तापमान प्रक्षेपण उपलब्ध कराता है। इसका उद्देश्य स्थानीय स्तर पर जलवायु अनुकूलन, आपदा तैयारी और जोखिम आकलन को अधिक सटीक बनाना है।
यह नया डेटासेट वैश्विक जलवायु मॉडलों की उस प्रमुख सीमा को दूर करता है, जिसमें कम रेज़ोल्यूशन के कारण भारत की जटिल भौगोलिक संरचना, मानसूनी परिवर्तनशीलता और क्षेत्रीय जलवायु चरम स्थितियों का सटीक आकलन संभव नहीं हो पाता था। विशेषज्ञों के अनुसार भारत पहले ही बढ़ते तापमान, अनियमित मानसून, शहरी बाढ़, फसलों और श्रमिकों पर गर्मी के दबाव तथा जल संसाधनों पर बढ़ते संकट जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में जिला और नदी बेसिन स्तर पर सटीक जलवायु प्रक्षेपण अत्यंत आवश्यक हो गए हैं।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की के जलविज्ञान विभाग द्वारा विकसित और Scientific Data में प्रकाशित “इंड्रा-सीएमआईपी6” डेटासेट 14 सीएमआईपी6 वैश्विक जलवायु मॉडलों के आउटपुट को “डबल बायस-करेक्टेड कंस्ट्रक्टेड एनालॉग (DBCCA)” तकनीक से डाउनस्केल करता है। यह तकनीक दैनिक मौसम परिवर्तनशीलता, क्षेत्रीय वर्षा पैटर्न और अत्यधिक तापमान की घटनाओं के अधिक सटीक प्रतिनिधित्व में सहायक है।
डेटासेट 0.1° × 0.1° रेज़ोल्यूशन पर दैनिक वर्षा, न्यूनतम और अधिकतम तापमान डेटा उपलब्ध कराता है। इसमें व्यक्तिगत मॉडल आउटपुट के साथ-साथ मल्टी-मॉडल एंसेंबल भी शामिल हैं, जिससे शोधकर्ता और योजनाकार विभिन्न जलवायु परिदृश्यों की तुलना कर सकते हैं और संभावित अनिश्चितताओं का आकलन कर सकते हैं।
तकनीकी परीक्षणों से यह स्पष्ट हुआ है कि “इंड्रा-सीएमआईपी6” कच्चे वैश्विक जलवायु मॉडल आउटपुट में मौजूद त्रुटियों को काफी हद तक कम करता है और अत्यधिक वर्षा तथा अत्यधिक तापमान वाले दिनों के पूर्वानुमान को बेहतर बनाता है। यह विशेष रूप से मानसून-प्रभावित और पर्वतीय क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस डेटासेट में चार “शेयर्ड सोशल-इकोनॉमिक पाथवे (SSP)” परिदृश्य शामिल किए गए हैं — SSP1-2.6, SSP2-4.5, SSP3-7.0 और SSP5-8.5। ये विभिन्न विकास और उत्सर्जन स्तरों के आधार पर भविष्य की संभावित जलवायु परिस्थितियों का वैज्ञानिक आकलन प्रस्तुत करते हैं। इनके माध्यम से शोधकर्ता यह समझ सकेंगे कि मजबूत जलवायु कार्रवाई और उच्च उत्सर्जन वाले भविष्य के बीच भारत के जलवायु जोखिम कैसे बदल सकते हैं।
“इंड्रा-सीएमआईपी6” की एक बड़ी विशेषता इसका ओपन-एक्सेस स्वरूप है। एंसेंबल डेटासेट “जेनोडो” पर उपलब्ध हैं, जबकि व्यक्तिगत मॉडलों के विस्तृत डाउनस्केल्ड आउटपुट “गूगल ड्राइव” के माध्यम से उपलब्ध कराए गए हैं। लगभग 2.4 टेराबाइट आकार वाला यह डेटासेट भारतीय उपमहाद्वीप के लिए उपलब्ध सबसे विस्तृत ओपन जलवायु डेटा संसाधनों में से एक माना जा रहा है।
यह डेटासेट विश्वविद्यालयों, सरकारी विभागों, नदी बेसिन प्राधिकरणों, आपदा प्रबंधन एजेंसियों, शहरी योजनाकारों और कृषि संस्थानों के लिए उपयोगी साबित होगा। इसका उपयोग बाढ़ और सूखा जोखिम आकलन, जलवायु-सहिष्णु अवसंरचना योजना, कृषि प्रभाव अध्ययन, जल प्रबंधन तथा स्थानीय अनुकूलन रणनीतियों के विकास में किया जा सकेगा।
प्रोफेसर अंकित अग्रवाल ने कहा कि भारत में जलवायु जोखिम अत्यंत स्थानीयकृत हैं, विशेषकर मानसून-प्रभावित और पर्वतीय क्षेत्रों में। ऐसे में “इंड्रा-सीएमआईपी6” जैसे सूक्ष्म-स्तरीय जलवायु प्रक्षेपण वैश्विक जलवायु विज्ञान को योजनाकारों, शोधकर्ताओं और नीति-निर्माताओं के लिए उपयोगी जानकारी में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
वहीं प्रोफेसर कमल किशोर पंत ने कहा कि जलवायु परिवर्तन वर्तमान समय की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है और वैज्ञानिक संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे समाज के लिए विश्वसनीय और सुलभ ज्ञान संसाधन विकसित करें। उन्होंने कहा कि “इंड्रा-सीएमआईपी6” जलवायु सहनशीलता, सतत विकास और साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण को समर्थन देने की दिशा में संस्थान की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
इस अध्ययन के लेखक जॉयजीत मंडल, दिव्या सरदाना, आकाश सिंह रघुवंशी और अंकित अग्रवाल हैं।



