इतिहास के गुमनाम सिपाही: आंदोलन की पहली आवाज़ पत्रकार, लेकिन जीत का श्रेय अक्सर किसी और के नाम जिसकी तस्वीर कभी नहीं छपी, वही आंदोलन की पहली आवाज़ था
देहरादून। (CM Jain) इतिहास की एक अजीब आदत है—वह अक्सर विजेताओं के नाम याद रखता है, लेकिन विजय की नींव रखने वालों को भुला देता है। आंदोलनों के मंच पर खड़े नेताओं की तस्वीरें इतिहास में दर्ज होती हैं, उनके भाषणों और संघर्षों का उल्लेख होता है, लेकिन उस पत्रकार का नाम अक्सर कहीं नहीं मिलता, जिसने सबसे पहले कैमरा उठाकर दुनिया को बताया कि कहीं कोई आवाज़ उठ रही है।
किसी भी जनआंदोलन की पहली जीत सड़क पर नहीं, सूचना में होती है और उस सूचना का पहला प्रहरी पत्रकार होता है।
किसी आंदोलन की शुरुआत में जब भीड़ कम होती है, संसाधन सीमित होते हैं और सत्ता का ध्यान उस ओर नहीं होता, तब अक्सर स्थानीय पत्रकार, स्वतंत्र पत्रकार और छोटे डिजिटल प्लेटफॉर्म ही मौके पर मौजूद होते हैं। उनके पास न बड़ी ओबी वैन होती है, न भारी-भरकम संसाधन। उनके पास होता है—एक मोबाइल, कैमरा, इंटरनेट और सच को सामने लाने का साहस।
धूप हो या बारिश, लाठीचार्ज हो या आँसू गैस, इंटरनेट बंद हो या प्रशासनिक दबाव—ये पत्रकार घटनास्थल पर खड़े रहकर तस्वीरें लेते हैं, वीडियो बनाते हैं, लाइव प्रसारण करते हैं और आंदोलनकारियों की आवाज़ लोगों तक पहुँचाते हैं। धीरे-धीरे वही आंदोलन बड़ा होता है और राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन जाता है। इसके बाद बड़े मीडिया संस्थान, बड़े कैमरे और बड़े मंच वहाँ पहुँचते हैं।
लेकिन तब एक सवाल खड़ा होता है—क्या हमने उन लोगों को याद रखा, जिन्होंने उस आंदोलन की पहली आवाज़ देश तक पहुँचाई थी?
हाल में जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन ने भी मीडिया की भूमिका और श्रेय को लेकर इस सवाल को फिर सामने ला दिया। शुरुआती दौर में अनेक स्वतंत्र पत्रकारों, स्थानीय रिपोर्टरों और छोटे डिजिटल प्लेटफॉर्मों ने आंदोलन को लगातार कवर किया। छात्रों की समस्याओं को सुना, उनके वीडियो बनाए और उनकी मांगों को व्यापक समाज तक पहुँचाया। जब आंदोलन राष्ट्रीय चर्चा में आया तो बड़े मीडिया संस्थानों की मौजूदगी भी बढ़ी।
यह किसी एक मीडिया संस्थान की आलोचना नहीं, बल्कि पत्रकारिता की उस कार्यप्रणाली पर विचार का विषय है जिसमें शुरुआत में जोखिम उठाने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे दृश्य से गायब हो जाता है और आंदोलन के बड़े होने के साथ बड़े चेहरे सामने आ जाते हैं।
दरअसल, हमें मीडिया और पत्रकार के बीच का अंतर समझना होगा। मीडिया एक संस्था, कंपनी या ब्रांड हो सकता है, लेकिन पत्रकार एक व्यक्ति होता है। कैमरा किसी संस्था का हो सकता है, लेकिन उसे सच की दिशा में घुमाने वाला हाथ पत्रकार का होता है।
नेता आंदोलन का चेहरा हो सकता है, लेकिन पत्रकार उसकी आँखें होता है। नेता भाषण देता है, पत्रकार उस आवाज़ को लाखों लोगों तक पहुँचाता है। नेता मंच से जनता को संबोधित करता है, पत्रकार उस मंच की तस्वीर समाज के सामने रखता है।
विडंबना यह है कि जो दूसरों को पहचान दिलाता है, वही स्वयं अक्सर गुमनाम रह जाता है।
आंदोलन समाप्त होते हैं। समझौते होते हैं। विजय सभाएँ होती हैं। पोस्टर छपते हैं। नेताओं को सम्मान मिलता है। लेकिन पत्रकार अगले संघर्ष की तलाश में निकल जाता है। उसे माला नहीं चाहिए, मंच नहीं चाहिए और शायद नायक कहलाने की इच्छा भी नहीं होती। वह अगले गाँव, अगले शहर और अगले सवाल की ओर बढ़ जाता है।
यही पत्रकारिता की ताकत भी है और उसकी सबसे बड़ी त्रासदी भी।
आज जब स्वतंत्र पत्रकार आर्थिक संकट, मुकदमों, दबाव और धमकियों के बीच अपना काम कर रहे हैं, तब समाज को यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल संसद और राजनीतिक संस्थाओं से नहीं चलता। लोकतंत्र उन लोगों से भी चलता है जो जनता और सत्ता के बीच सूचना का पुल बनते हैं।
अगली बार जब किसी आंदोलन की सफलता का जश्न मनाया जाए तो मंच पर खड़े चेहरों के साथ उन गुमनाम पत्रकारों को भी याद किया जाना चाहिए, जिन्होंने उस आंदोलन को देश के हर मोबाइल स्क्रीन तक पहुँचाया।
क्योंकि किसी आंदोलन की पहली आवाज़ मंच से नहीं, अक्सर कैमरे के पीछे से आती है।
इतिहास को अब यह भी लिखना होगा कि आंदोलन का नेतृत्व किसने किया, लेकिन उससे पहले यह भी कि उस आंदोलन की पहली आवाज़ देश तक पहुँचाने वाला कौन था।
क्योंकि लोकतंत्र में कई बार सबसे बड़ा योद्धा वह नहीं होता जो मंच पर दिखाई देता है।
सबसे बड़ा योद्धा वह होता है, जिसकी तस्वीर कभी छपती ही नहीं।