आईआईटी रुड़की के अनुसंधान से हिमालयी गांव में कम जल उपलब्धता वाले मौसम में पानी की उपलब्धता हुई दोगुनी
वैज्ञानिक अनुसंधान से हिमालयी क्षेत्र में जल सुरक्षा के लिए व्यावहारिक पहल
•दो अध्ययनों में लघु हिमालय क्षेत्र में जलस्रोतों के पुनर्भरण की गतिशीलता और भूजल प्रक्रियाओं का विश्लेषण
•विज्ञान-आधारित पहल से उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल स्थित ऊंचौन गांव में नए जलस्रोत का विकास
रूड़की 02 नवंबर । हिमालयी क्षेत्र में मौसमी जल संकट की समस्या के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास करते हुए, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की (आईआईटी रुड़की) ने उत्तराखंड के टिहरी जिले के ऊंचौन गांव में एक नए जलस्रोत का विकास किया है। इस पहल के परिणामस्वरूप कम जल उपलब्धता वाले मौसम में पेयजल की उपलब्धता लगभग 500 लीटर से बढ़कर प्रतिदिन 1,000 लीटर या उससे अधिक हो गई है। यह दर्शाता है कि हिमालयी जलस्रोत प्रणालियों की वैज्ञानिक समझ ग्रामीण जल सुरक्षा के लिए व्यावहारिक समाधान विकसित करने में किस प्रकार सहायक हो सकती है।
यह पहल “टिहरी जिले के तकोली गाड जलग्रहण क्षेत्र में सूखते जलस्रोतों का पुनर्जीवन” परियोजना का हिस्सा है। इस परियोजना को नमामि गंगे, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन, जल शक्ति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा वित्तपोषित किया गया है। आईआईटी रुड़की इस परियोजना का प्रमुख संस्थान है तथा पृथ्वी विज्ञान विभाग के प्रो. अभयानंद सिंह मौर्य इसके प्रधान अन्वेषक हैं।
यह हस्तक्षेप लघु हिमालय क्षेत्र में स्थित तकोली गाड जलग्रहण क्षेत्र में किए गए दो अनुसंधान अध्ययनों के निष्कर्षों पर आधारित है। यह क्षेत्र अलकनंदा नदी बेसिन के अंतर्गत लगभग 143 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। दोनों अध्ययन जलस्रोतों के पुनर्भरण को नियंत्रित करने वाली जल-मौसम विज्ञान संबंधी प्रक्रियाओं तथा भूजल की रासायनिक संरचना को प्रभावित करने वाले भूवैज्ञानिक कारकों का विश्लेषण करते हैं।
पहला अध्ययन, “स्थिर एवं रेडियो समस्थानिकों के माध्यम से अलकनंदा नदी बेसिन में जलस्रोत पुनर्भरण की गतिशीलता से जुड़ी जल-मौसम विज्ञान संबंधी प्रक्रियाओं का विश्लेषण”, 12 अक्टूबर 2026 को हाइड्रोलॉजिकल साइंसेज जर्नल में ऑनलाइन प्रकाशित हुआ। स्थिर समस्थानिकों, ट्रिटियम मापन और जल-मौसम विज्ञान संबंधी आंकड़ों का उपयोग करते हुए शोधकर्ताओं ने जलस्रोतों के पुनर्भरण की गतिशीलता और भूजल के स्रोतों का अध्ययन किया। अध्ययन के अनुसार, जलस्रोतों के पुनर्भरण में लगभग 82 प्रतिशत योगदान मानसूनी वर्षा का है, जबकि शीतकालीन और मानसून-पूर्व वर्षा का योगदान क्रमशः लगभग 10 प्रतिशत और 8 प्रतिशत है। ये निष्कर्ष विभिन्न मौसमों में जलस्रोत प्रणालियों को बनाए रखने में मानसूनी जल के अंतःप्रवेश और भूजल भंडारण के महत्व को रेखांकित करते हैं।
दूसरा अध्ययन, “हिमनद-विहीन लघु हिमालयी जलस्रोत प्रणाली में मौसमी अपक्षय प्रक्रियाओं पर शैलविज्ञान संबंधी नियंत्रण”, वर्ष 2026 में एप्लाइड जियोकेमिस्ट्री में प्रकाशित हुआ। यह अध्ययन विश्लेषण करता है कि भूवैज्ञानिक संरचनाएं और मौसमी अपक्षय प्रक्रियाएं जलस्रोतों के पानी की रासायनिक संरचना को किस प्रकार प्रभावित करती हैं। शोध में कार्बोनेट शैलों का अपक्षय, मौसमी पुनर्भरण और मानवीय गतिविधियों को जल की रासायनिक विशेषताओं को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों के रूप में पहचाना गया है।
दोनों अध्ययन मिलकर उन प्रक्रियाओं की पूरक जानकारी प्रदान करते हैं जो जलस्रोतों का पुनर्भरण करती हैं और उनकी जल गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। ये निष्कर्ष स्थल-विशिष्ट जलस्रोत क्षेत्र प्रबंधन और भूजल संरक्षण के लिए वैज्ञानिक आधार उपलब्ध कराते हैं।
भूभौतिकीय जांच के माध्यम से जलधारण करने वाली शैल परतों की पहचान की गई, जिनमें भूजल के भंडारण और प्रवाह की क्षमता है। इन निष्कर्षों के आधार पर आईआईटी रुड़की की टीम ने जलधारण करने वाले क्षेत्रों की गहराई और विस्तार का आकलन किया तथा ऊपर की ढलान पर कई खाइयों के निर्माण की योजना तैयार की। ये खाइयां सतही जल के प्रवाह को धीमा करने में सहायता करती हैं, जिससे पानी को भूमि के भीतर रिसने और भूजल पुनर्भरण में योगदान देने का अवसर मिलता है। चिन्हित जलधारण क्षेत्र में एक नियंत्रित मार्ग बनाया गया, जिससे भूजल सतह पर आ सके। इस प्रकार एक नए जलस्रोत का विकास हुआ और कम जल उपलब्धता वाले मौसम में स्थानीय स्तर पर पानी की उपलब्धता में सुधार हुआ।
एक नया जलस्रोत उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के कीर्तिनगर ब्लॉक स्थित ऊंचौन गांव, डाकघर तकोली में, चंद्रबदनी मंदिर की ओर जाने वाली नवनिर्मित सड़क के किनारे विकसित किया गया है। इस पहल का उद्देश्य स्थानीय जलस्रोतों पर निर्भर परिवारों के सामने आने वाली मौसमी जल कमी की समस्या का समाधान करना है। प्रतिदिन पानी की उपलब्धता लगभग 500 लीटर से बढ़कर 1,000 लीटर या उससे अधिक होना एक महत्वपूर्ण सुधार है। इससे स्थानीय समुदाय, विशेषकर गर्मियों के महीनों में, काफी राहत मिलने की उम्मीद है।
यह पहल दर्शाती है कि भूजल विज्ञान संबंधी आकलन, पुनर्भरण मार्गों की समझ और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप हस्तक्षेप को एक साथ जोड़कर जल संकट का समाधान किया जा सकता है। जलस्रोत के प्रवाह और जल गुणवत्ता की निरंतर निगरानी के साथ-साथ सामुदायिक भागीदारी, इस पहल के दीर्घकालिक परिणामों का आकलन करने और हिमालयी क्षेत्र के अन्य स्थानों पर ऐसे प्रयासों को दिशा देने के लिए महत्वपूर्ण होगी।
हिमालयी जलस्रोत पर्वतीय समुदायों के लिए मीठे पानी के महत्वपूर्ण स्रोत हैं, विशेषकर दूरस्थ बस्तियों में जहां पानी के वैकल्पिक स्रोत सीमित हैं। हालांकि, बताया जाता है कि लगभग 50 प्रतिशत जलस्रोत या तो पूरी तरह सूख चुके हैं या उनमें पानी का प्रवाह गंभीर रूप से कम हो गया है, विशेषकर गर्मियों के दौरान। इसलिए जलस्रोतों के प्रवाह को नियंत्रित करने वाले भूवैज्ञानिक और जलवैज्ञानिक कारकों को समझना, जलस्रोतों के वैज्ञानिक निर्माण एवं पुनर्जीवन की रणनीतियां विकसित करने, जलग्रहण क्षेत्रों के संरक्षण और दीर्घकालिक पेयजल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
आईआईटी रुड़की के पृथ्वी विज्ञान विभाग के प्रो. अभयानंद सिंह मौर्य ने कहा, “हिमालयी क्षेत्र में जल संकट का समाधान करने के लिए जलस्रोतों के स्रोत, प्रवाह और मौसमी व्यवहार को समझना आवश्यक है। हमारा अनुसंधान जल के इन महत्वपूर्ण स्रोतों को बनाए रखने में मानसूनी पुनर्भरण, भूजल भंडारण और भूवैज्ञानिक परिस्थितियों के महत्व को रेखांकित करता है। इस प्रकार की वैज्ञानिक जानकारी स्थल-विशिष्ट हस्तक्षेपों का मार्गदर्शन कर सकती है और पर्वतीय समुदायों के लिए जलस्रोतों के अधिक टिकाऊ प्रबंधन में सहायता कर सकती है।”
आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो. के. के. पंत ने कहा, “वैज्ञानिक अनुसंधान का सबसे बड़ा सामाजिक योगदान तब होता है, जब वह समुदायों के सामने आने वाली चुनौतियों के समाधान में सहायक बनता है। हिमालयी जलस्रोत प्रणालियों को समझने की दिशा में आईआईटी रुड़की के प्रयास स्थानीय आवश्यकताओं और सतत संसाधन प्रबंधन के साथ अनुसंधान को जोड़ने के महत्व को दर्शाते हैं। वैज्ञानिक साक्ष्यों को धरातल पर क्रियान्वित करके हमारा उद्देश्य हिमालयी क्षेत्र में जल सुरक्षा के लिए व्यावहारिक और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप समाधान विकसित करने में योगदान देना है।”
अनुसंधान को धरातल पर किए जाने वाले हस्तक्षेपों से जोड़कर आईआईटी रुड़की जलस्रोत क्षेत्र प्रबंधन और ग्रामीण जल सुरक्षा के लिए साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण विकसित करने में योगदान दे रहा है। ऊंचौन गांव का यह अनुभव दर्शाता है कि वैज्ञानिक अध्ययन और स्थानीय स्तर पर किए गए प्रयासों को एक साथ जोड़कर हिमालयी क्षेत्र में जल संबंधी चुनौतियों का समाधान करने की संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं।
अनुसंधान प्रकाशन
1.कुमार एवं अन्य (2026)। स्थिर एवं रेडियो समस्थानिकों के माध्यम से अलकनंदा नदी बेसिन में जलस्रोत पुनर्भरण की गतिशीलता से जुड़ी जल-मौसम विज्ञान संबंधी प्रक्रियाओं का विश्लेषण। हाइड्रोलॉजिकल साइंसेज जर्नल। https://doi.org/10.1080/02626667.2026.2729468
2.कुमार एवं अन्य (2026)। हिमनद-विहीन लघु हिमालयी जलस्रोत प्रणाली में मौसमी अपक्षय प्रक्रियाओं पर शैलविज्ञान संबंधी नियंत्रण। एप्लाइड जियोकेमिस्ट्री, 206, 106891। https://doi.org/10.1016/j.apgeochem.2026.106891