प्रयोगात्मक षोडश संस्कार कार्यशाला के द्वितीय दिवस पर अरणी मंथन, नामकरण व निष्क्रमण संस्कार का प्रशिक्षण

हरिद्वार 12 मार्च । उत्तराखंड संस्कृत संस्थान द्वारा आयोजित प्रयोगात्मक षोडश संस्कार कार्यशाला के द्वितीय दिवस पर प्रतिभागियों को वैदिक परंपराओं से जुड़े महत्वपूर्ण संस्कारों का प्रयोगात्मक प्रशिक्षण दिया गया। कार्यक्रम में आचार्य विशालमणि ने अरणी मंथन, नामकरण संस्कार तथा निष्क्रमण संस्कार की विधियों का विस्तृत एवं व्यवहारिक प्रदर्शन किया।
कार्यशाला में प्रशिक्षक आचार्य अंकित बहुगुणा ने बताया कि अरणी मंथन वैदिक परंपरा में अग्नि उत्पन्न करने की प्राचीन वैज्ञानिक विधि है, जो भारतीय संस्कृति की मौलिकता और प्रकृति से उसके गहरे संबंध को दर्शाती है। उन्होंने नामकरण संस्कार की विधि, उसके धार्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व तथा शिशु के जीवन पर उसके सकारात्मक प्रभावों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
इसी क्रम में निष्क्रमण संस्कार की प्रक्रिया का भी अभ्यास कराया गया। इसमें शिशु को पहली बार घर से बाहर लाकर प्रकृति और सूर्य के सान्निध्य से परिचित कराने की परंपरा के महत्व को समझाया गया। प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों ने स्वयं इन संस्कारों की विधियों को करके उनके महत्व और प्रक्रिया को समझा।
कार्यशाला में उपस्थित शिक्षकों, विद्यार्थियों और संस्कार प्रेमियों ने इस प्रशिक्षण को भारतीय संस्कृति के संरक्षण और प्रसार की दिशा में अत्यंत उपयोगी बताया। कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए आगामी सत्रों में अन्य संस्कारों के प्रशिक्षण की जानकारी दी।
इस अवसर पर संयोजक सुभाष जोशी, सहसंयोजक/नोडल अधिकारी मनोज शर्मा, श्री महाकाल सेवा समिति के अध्यक्ष रोशन राणा, विनय प्रजापति, योगेश सकलानी सहित अनेक प्रशिक्षु उपस्थित रहे।



