भजने योग्य केवल परमात्मा हैं: आचार्य ममगाईं

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देहरादून 12 मई । खैरी मानसिंह माल देवता में चौहान परिवार द्वारा आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण की कथा के सातवें दिन भक्तों को सम्बोधित करते हुए ज्योतिष्पीठ व्यास आचार्य शिवप्रसाद ममगांई जी ने कहा श्री भगवान यह कहते हैं कि मैं जो सारे भूतों में आत्म रूप से स्थित हूं, ऐसे मुझ परमात्मा में जो एक ही भाव से स्थित है, माने मुझमें जो तन्मय हो गया है ऐसा भक्त संसार में भी विचरता हुआ भी, उसका जो विचरण है, भगवान कहते हैं उसकी जो क्रीडा है वह मेरे में ही है। उसकी दृष्टि में मेरे सिवा कोई वस्तु नहीं है। वह सब जगह मुझे ही देखता है और मेरे में ही रमण करता है। मेरे में ही रमण करता है इसमें एकता की विशेषता दिखलायी। इस प्रकार समझो कि वास-स्थान की तरफ ख्याल करो तो भगवान में ही बसना चाहिए, उससे अच्छा वास-स्थान कोई नहीं है। भजने की ओर ख्याल करो तो भजन के योग्य परमात्मा है उससे बढ़कर कोई भजन के योग्य नहीं प्रेम करने की बात कहो तो भगवान ही प्रेम करने के योग्य हैं, उनके समान कोई प्रेम करने का पात्र नहीं। तो एकता करनी तो भगवान में, प्रेम करना तो भगवान में, ध्यान करना तो भगवान का, भजन करना तो भगवान का, वास करना तो भगवान में, दोस्ती करनी तो भगवान में, क्योंकि इस प्रकार हर प्रकार से भगवान अपने हैं– यह बात यदि मनुष्य की समझ में आ जाय तो वह एक क्षण भी भगवान को छोड़ नहीं सकता, अलग नहीं रह सकता। उसको भूल नहीं सकता– ऐसा जो भाव है, ऐसी जो स्थिति है, वह उस परमात्मा में परम प्रेम का साधन है। उसे प्रेम का साधन कह दो या ध्यान कह दो। अतः सब काम छोड़कर इसके लिए हम लोगों को प्राणपर्यंत चेष्टा करनी चाहिए, तत्परता के साथ चेष्टा करनी चाहिए, जब आगे जाकर आपको इसमें आनंद आने लगेगा, मजा आने लगेगा तब तो आप खुद ही नहीं छोड़ सकेंगे।
हां प्राणपर्यंत चेष्टा करनी चाहिए। यह बात इसलिए बतलायी जाती है कि जितनी चेष्टा होनी चाहिए उतनी नहीं होती। यदि पूरी चेष्टा होने लगे तो खुद ही नहीं छोड़ सकता। इसलिए यह समझना चाहिए कि भगवान के समान हमारा कोई नहीं है, भगवान हमारे परम हितैषी हैं, भगवान हमारे परम प्यारे हैं, भगवान स्वयं हमारे हैं, भगवान हमारे अपने-आप हैं, भगवान हमारी आत्मा है यह जो प्रेम का अंश बतलाया गया, यह समझ में आने के साथ ही मनुष्य भगवान का अनन्य प्रेमी बन जाता है। यदि नहीं बनता है तो समझो यह बात समझी ही नहीं, सुन कर के विश्वास नहीं हुआ। सुनकर के यदि विश्वास हो जाय, श्रद्धा हो जाय तो फिर उसी वक्त वह बन ही जाना चाहिये। उसकी कसौटी यह है कि जिस समय प्रेम का ऐसा भाव हृदय में उत्पन्न होता है, हृदय एकदम गदगद हो जाता है, प्रफुल्लित हो जाता है, शरीर में रोमांच होने लगता है कभी-कभी अश्रुपात होने लगता ।आयोजन कर्ता मुख्य यजमान अजय चौहान जी ने कहा कि भागवत कथा में बहुत दूर से लोगों ने आकर कथा का आनन्द लिया और एक बहुत बड़ भण्डारे के साथ भागवत जी का समापन हुआ
इस अवसर पर मुख्य रूप से विधायक उमेश शर्मा काऊ पूर्व अध्यक्ष शमशेर सिंह पुंडीर प्रधान अजय चौहान पूर्व प्रधान सुरेश पुंडीर राजपुर क्षेत्र की पार्षद उर्मिला ढौंडियाल थापा कुसुम नेगी डाक्टर दीपक जुगराण अंकिता जुगरान सुंदर चौहान महेंद्र चौहान सुरेश पुंडीर आनंद नेगी संदीप चौहान ऋतू विजलवान आयुष उनियाल ऐतवारी देवी शोभन् जवाड़ी सुशीला चौहान प्रमिला देवी रश्मि चौहान गोविंद चौहान आयुषी आराध्या घनश्याम चौहान रंजीत जवाड़ी आदि भक्त गण भारी संख्या मे उपस्थित रहे।