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श्रम संहिताएंः एक नई दृष्टि प्रो बीजू वर्के, डॉ शैलजा त्रिपाठी

देहरादून 16 फरवरी। चार श्रम संहिताओं की 21 नवंबर, 2025 को आधिकारिक घोषणा के साथ ही एक नए युग की शुरुआत हो गई है। यह घोषणा भारत की श्रम कानून व्यवस्था में एक बड़े ढांचागत सुधार का संकेत है। अनुमानों के अनुरूप ही इसकी सराहना और आलोचना, दोनों ही की गई है। बहुप्रतीक्षित श्रम कानून सुधारों ने कामगारों से संबंधित 29 से ज्यादा कानूनों को चार व्यापक संहिताओं में समेट दिया है।
भारतीय श्रम कानूनों में सुधारों की मांग लंबे अरसे से चली आ रही थी। इस संबंध में समय-समय पर सीमित घोषणाएं की गईं और उन्हें टुकड़ों में लागू किया गया। सभी हितधारक इस बात पर सहमत थे कि देश को आगे ले जाने के लिए एक उत्पादक, समावेशी और सशक्त कार्यबल तथा कामकाज का उपयुक्त परिवेश जरूरी है। बदलाव की इच्छा सब में होने के बावजूद हर हितधारक की अपनी अलग-अलग उम्मीदें और चिंताएँ थीं।
इन सुधारों का उद्देश्य श्रमिक कल्याण को मजबूती देना और अनुपालन को सरल बनाना है। श्रम नियमन के ढांचे को वर्तमान आर्थिक और सामाजिक वास्तविकताओं के अनुरूप बनाना तथा व्यवसाय सुगमता में वृद्धि के उपायों को मजबूत करना भी इनका उद्देश्य रहा है। इन सुधारों के तहत 29 महत्वपूर्ण कानूनों को वेतन, सामाजिक संरक्षा, व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा तथा औद्योगिक संबंध से जुड़ी चार संहिताओं में समेट दिया गया है। नई व्यवस्था का उद्देश्य श्रमिकों के कामकाज को औपचारिक रूप देना, कानून के दायरे से अब तक बाहर रहे अनौपचारिक, अस्थाई और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए काम करने वाले कामगारों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना, महिला अधिकारों का संवर्द्धन तथा सभी क्षेत्रों में नियोक्ता-श्रमिक संबंधों को आधुनिक बनाना है।
नई श्रम संहिताओं की नीचे वर्णित कुछ विशिष्टताएं उन्हें देश की मौजूदा और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप बनाती हैं-
सुदृढ़ीकरण और सामंजस्यः भारत के श्रम कानून ऐतिहासिक तौर पर विभाजित तथा परिभाषाओं की बहुलता और सख्त अनुपालन व्यवस्थाओं से ग्रसित थे। नियोक्ताओं को एकदूसरे से मिलती-जुलती अनेक नियामक जरूरतों का सामना करना पड़ता था। श्रमिक और खास तौर से असंगठित कामगार आम तौर पर वैधानिक संरक्षण के दायरे से बाहर थे। श्रम संहिताओं ने अनुपालन की पिछली जटिल प्रणाली को समरूप परिभाषाओं, डिजिटल प्रक्रियाओं और विस्तारित दायरे से सरल बनाया है।
सम्मानजनक कार्य सिद्धांतों का अनुपालनः सुधारों में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के सम्मानजनक कार्य सिद्धांतों को शामिल किया गया है। इन कार्य सिद्धांतों में उच्च गुणवत्ता वाले रोजगारों का सृजन, श्रमिक अधिकारों और समानता का संरक्षण तथा सामाजिक सुरक्षा और संवाद शामिल है।
अनुपालन का सरलीकरणः पुरानी प्रणाली में अत्यधिक कागजी कार्रवाई, निरीक्षणों पर अतिनिर्भरता और कमजोर अनुपालन जैसी खामियां थीं। नई संहिताओं में अनुपालन प्रणालियों को सुचारू बनाने के साथ ही उल्लंघनों को रोकने के लिए कठोर दंड की व्यवस्था की गई है।
संवहनीय विकास लक्ष्यों के साथ तालमेलः ये संहिताएं श्रमिक अधिकारों को मजबूत कर, सामाजिक सुरक्षा का विस्तार करते हुए तथा समावेशी विकास को बढ़ावा देकर संवहनीय विकास लक्ष्य (एसडीजी) 8 को आगे बढ़ाती हैं। इसके अलावा ये एसडीजी 1,3,5 और 10 को हासिल करने में भी सहायक हैं।
कार्य संबंधी भविष्य की जरूरतों के अनुरूपः इन संहिताओं में तेज आर्थिक और प्रौद्योगिकीय बदलावों को ध्यान में रखा गया है। इनमें विस्तारित परिभाषाओं, पुनर्प्रशिक्षण के प्रावधानों, व्यापक सामाजिक सुरक्षा कवरेज और वैकल्पिक कार्य व्यवस्थाओं के औपचारीकरण के जरिए भविष्य की कार्य संबंधी चिंताओं का निराकरण किया गया है।
संहिताओं की मुख्य विशेषताएं और उनका प्रभाव:
वेतन संहिता, 2019: यह संहिता पिछले चार कानूनों को एकीकृत करती है और “मजदूरी” की एक समान परिभाषा तथा ‘राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी’ की अवधारणा पेश करती है। यह व्यापक और अधिक सुसंगत वेतन सुरक्षा सुनिश्चित करती है, समय पर भुगतान को अनिवार्य बनाती है, और समान पारिश्रमिक के नियम को सुदृढ़ करती है, जिससे आय सुरक्षा मजबूत होती है और विवादों में कमी आती है।
औद्योगिक संबंध संहिता, 2020: यह संहिता मजदूर संगठनों, औद्योगिक विवादों और स्थायी आदेशों को नियंत्रित करने वाले कानूनों को एक साथ लाती है। यह विवाद समाधान की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करती है, निश्चित समय-सीमा निर्धारित करती है और हड़ताल, कामबंदी तथा छंटनी से जुड़े नियमों को तर्कसंगत बनाती है। जहाँ यह नियोक्ताओं को परिचालन के लिए लचीलापन प्रदान करती है, वहीं सामूहिक सौदेबाजी और कानूनी समाधान के लिए सुरक्षा उपायों को भी बरकरार रखती है।
सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020: यह संहिता संगठित क्षेत्र से आगे जाकर सुरक्षा के दायरे का विस्तार करके एक बड़े बदलाव का संकेत देती है। इसके अंतर्गत गिग कामगारों, प्लेटफॉर्म के जरिये काम करने वाले श्रमिकों को भविष्य निधि, बीमा, मातृत्व लाभ और वृद्धावस्था सुरक्षा से संबंधित वैधानिक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ देने का प्रावधान किया गया है।
व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थिति (ओएसएच) संहिता, 2020: यह ओएसएच संहिता सुरक्षा से संबंधित कई कानूनों को एक एकीकृत ढांचे में समाहित करती है। यह कार्यस्थल सुरक्षा मानदंडों का मानकीकरण करती है, नियामक निरीक्षण को मजबूत करती है और सभी क्षेत्रों में इसे लागू करने में सुधार करती है।
आगे की राह क्या है?
वी. वी. गिरि राष्ट्रीय श्रम संस्थान द्वारा नए श्रम कानूनों के बारे में नियोक्ताओं और कर्मचारियों के बीच हाल ही में किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि इन संहिताओं ने बेहतर भविष्य के प्रति सकारात्मक उम्मीद जगाई है। जहाँ 64% श्रमिकों का मानना है कि संहिताओं के लागू होने से आय सुरक्षा बढ़ेगी, वहीं नियोक्ताओं ने भी निश्चित अवधि के रोजगार अनुबंधों (64%) और कार्यस्थल सुरक्षा (73%) को लेकर इसी तरह के भाव व्यक्त किए हैं। दोनों ही हितधारक इन संहिताओं को एक ऐसे साधन के रूप में देखते हैं जो दोनों पक्षों के अनुभवों को बेहतर बनाएगा।
चारों श्रम संहिताएं भारत के श्रम शासन में एक ऐतिहासिक परिवर्तन का प्रतीक हैं। पुराने पड़ चुके कानूनों को एकीकरण, सामाजिक सुरक्षा के दायरे का विस्तार और नियोक्ताओं के लचीलेपन तथा श्रमिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाकर, इन सुधारों का उद्देश्य एक अधिक कुशल, समावेशी और विकासोन्मुखी श्रम बाजार बनाना है। चूंकि ये संहिताएं कार्यान्वयन के शुरुआती चरण में हैं, इसलिए यह आवश्यक है कि सभी हितधारक इन्हें खुले मन से अपनाएं और ‘विफलता से सीखकर तेजी से सुधार’ करने वाला दृष्टिकोण रखें। इनकी अंतिम सफलता इनके प्रभावी कार्यान्वयन, हितधारकों के बीच जागरूकता पैदा करने और संवैधानिक मूल्यों तथा अंतर्राष्ट्रीय श्रम मानकों की तरह निरंतर अमल में लाने पर निर्भर करेगी।

लेखक, प्रो. बीजू वर्के आईआईएम अहमदाबाद में प्रोफेसर और डॉ शैलजा त्रिपाठी वेजइंडिकेटर हैं

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