राज्यसभा में डॉ. नरेश बंसल की पहल — भारतीय ज्ञान परंपरा व संस्कृत के संरक्षण हेतु उच्च कदम उठाने की मांग
देहली/देहरादून, 08 दिसंबर। भाजपा राष्ट्रीय सह-कोषाध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद डॉ. नरेश बंसल ने सदन में शून्यकाल के दौरान भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा और संस्कृत भाषा के संरक्षण एवं प्रसार का महत्वपूर्ण विषय उठाया। उन्होंने कहा कि संस्कृत भारतीय ज्ञान परंपरा की आधारशिला है और इसी के माध्यम से मानव सभ्यताओं का विकास संभव हुआ है। विश्व की अनेक भाषाओं की जड़ें किसी न किसी रूप में संस्कृत से जुड़ी हुई हैं।
डॉ. बंसल ने कहा कि वेद, पुराण और उपनिषद जैसे भारतीय विरासत के आधार ग्रंथ संस्कृत में रचे गए हैं, जिनमें अद्वितीय और उच्च कोटि का ज्ञान समाहित है। योग, गणित, व्याकरण, कालगणना, पर्यावरण और दर्शन जैसे विविध क्षेत्रों में संस्कृत में अपार ज्ञान विद्यमान है।
उन्होंने चिंता व्यक्त की कि आज जबकि दुनिया संस्कृत में लिखित ज्ञान पर शोध कर रही है, भारत के लोग अपनी ही समृद्ध ज्ञान परंपरा से दूर होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि जो ज्ञान बच्चों को प्रारंभ से कंठस्थ होना चाहिए, वह आज विदेशों से सीखकर वापस भारत पहुंच रहा है।
सांसद ने उल्लेख किया कि NASA सहित अनेक वैश्विक संस्थाओं ने संस्कृत को वैज्ञानिक और कंप्यूटर-अनुकूल भाषा के रूप में मान्यता दी है। आइंस्टीन, मैक्समूलर, निकोला टेस्ला और जोहान्स केप्लर जैसे महान वैज्ञानिकों ने भी संस्कृत की वैज्ञानिकता को स्वीकार किया है। लेकिन भारत में इसे अलग-थलग करने का एक गलत आख्यान गढ़ा गया।
डॉ. बंसल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उपनिवेशवादी मानसिकता से बाहर निकलते हुए भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा को पुनर्स्थापित करने के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक, व्यवहारिक और वैश्विक स्तर पर उपयोगी बनाने हेतु बड़े कदम उठाए जाएं।
उन्होंने सुझाव दिया कि—
सभी के लिए संस्कृत एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन की व्यवस्था की जाए।
पांडुलिपियों के संरक्षण, संकलन और सरल भाषा में उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
संस्कृत भाषा को आधुनिक और व्यवहारिक रूप में अभियान चलाकर पुनर्जीवित किया जाए।
डॉ. बंसल ने कहा कि विश्व गुरु बनने के लिए भारत को अपनी मूल ज्ञान परंपरा और संस्कृत भाषा को अपनाना होगा। इसे कठिन भाषा समझकर दूरी बनाना मात्र एक भ्रम है। भारत की सांस्कृतिक आत्मा संस्कृत में निहित है, और इसे गर्व के साथ पुनः स्थापित करने का समय आ गया है।
