उत्तराखण्डधर्म-कर्म

शंखचूड़ की हड्डियों से हुई शंख की उत्पत्ति, शालिग्राम-तुलसी का संबंध भी बताया

नयागांव-रतनपुर में श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन आचार्य शिवप्रसाद ममगाईं ने सुनाए भगवान विष्णु, शंखचूड़ और तुलसी से जुड़े प्रसंग

देहरादून 01 अक्टूबर । नयागांव-रतनपुर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन कथा व्यास आचार्य शिवप्रसाद ममगाईं ने श्रद्धालुओं को जड़भरत प्रसंग के साथ भगवान विष्णु, शालिग्राम, तुलसी और शंखचूड़ से जुड़े पौराणिक प्रसंगों का श्रवण कराया। कथा के दौरान उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा में शंख को भगवान विष्णु का प्रिय और अत्यंत पवित्र माना गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार शंखचूड़ का भगवान शिव के हाथों वध होने के बाद उसके शरीर की हड्डियों से शंख की उत्पत्ति हुई। भगवान विष्णु ने इसी शंख को विजय के प्रतीक के रूप में धारण किया और शंखनाद की परंपरा का विशेष धार्मिक महत्व माना गया।
आचार्य ममगाईं ने बताया कि शंखचूड़ की कथा का संबंध तुलसी जी से भी जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथा के अनुसार शंखचूड़ की पत्नी तुलसी के शील भंग के प्रसंग के बाद भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप धारण करने और तुलसी के गण्डकी नदी तथा तुलसी-वृक्ष के रूप में प्रकट होने की मान्यता है। इसी कारण वैष्णव परंपरा में शालिग्राम भगवान और तुलसी का संबंध अत्यंत पवित्र माना जाता है तथा शालिग्राम भगवान को तुलसी दल अर्पित करने की विशेष महिमा बताई गई है।
उन्होंने कहा कि शालिग्राम तीर्थ और गण्डकी नदी का भी विशेष धार्मिक महत्व है। मान्यता के अनुसार तुलसी जी के शरीर से गण्डकी नदी तथा उनके रोमों से तुलसी-वृक्ष की उत्पत्ति हुई, जबकि भगवान विष्णु ने शालिग्राम शिला का स्वरूप धारण किया। यही कारण है कि सनातन धर्म में शालिग्राम और तुलसी की पूजा को विशेष स्थान प्राप्त है।
कथा के दौरान बदरीनाथ धाम में शंख न बजाए जाने की परंपरा का भी उल्लेख किया गया। आचार्य ने बताया कि बदरीनाथ धाम भगवान विष्णु के प्रमुख धामों में से एक है और वहां पूजा-पद्धति से जुड़ी अनेक विशिष्ट धार्मिक परंपराएं प्रचलित हैं। पौराणिक मान्यताओं में अतापी-वतापी राक्षसों की कथा भी इस परंपरा से जोड़ी जाती है। मान्यता के अनुसार भगवान अगस्त्य ने इन राक्षसों का संहार किया था और वतापी के शंख में छिपने की कथा के कारण बदरी क्षेत्र में शंखनाद न करने की परंपरा प्रचलित हुई।
उन्होंने एक अन्य धार्मिक मान्यता का उल्लेख करते हुए कहा कि बदरी क्षेत्र में माता लक्ष्मी तपस्या में लीन थीं। भगवान विष्णु ने उनकी तपस्या में किसी प्रकार का विघ्न न हो, इसलिए वहां शंखनाद नहीं किया। कथा परंपरा में यह भी कहा जाता है कि यदि माता लक्ष्मी पूछें कि शंखनाद क्यों किया गया तो भगवान को उत्तर देना पड़ेगा कि वे उस समय कहां थे। इसी मान्यता से बदरीनाथ धाम में शंख न बजाने की परंपरा को जोड़कर देखा जाता है।
कथा व्यास ने श्रद्धालुओं से भगवान के प्रति श्रद्धा, भक्ति और धार्मिक परंपराओं के मूल भाव को समझने का आह्वान किया। कथा के दौरान भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण बना रहा तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने कथा का श्रवण किया।
इस अवसर पर आचार्य रमेश उनियाल, आचार्य सुरेश उनियाल, आचार्य विजेंद्र उनियाल, आचार्य उदय शंकर भट्ट, शशि उनियाल, दामिनी उनियाल, रानी उनियाल, आचार्य दामोदर सेमवाल सहित अन्य श्रद्धालु एवं आयोजन से जुड़े लोग उपस्थित रहे।

Related Articles

Back to top button