गुरुपूर्णिमा महापर्व: आत्मज्ञान का मार्ग दिखाने वाले गुरु ही जीवन के सच्चे उद्धारक — पूज्य आर्यिका पूर्णमति गुरुमाँ
देहरादून, 29 जुलाई। गुरुपूर्णिमा महापर्व के पावन अवसर पर पूज्य गुरुमाँ ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए गुरु की महिमा, भगवान महावीर स्वामी की दिव्यध्वनि तथा आत्मज्ञान के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने भावपूर्ण वंदना “ऐ मेरे आदिदेव, ऐ मेरे देवाधिदेव, कोटि-कोटि प्रणाम…” के साथ अपने प्रवचन का शुभारंभ किया।
गुरुमाँ ने कहा कि गुरु बाहरी अंधकार को दूर करने के लिए नहीं, बल्कि जीव के भीतर बसे अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाने के लिए होते हैं। संसार की चकाचौंध से हटाकर आत्मा की ज्योति तक पहुँचाने वाला केवल गुरु ही होता है। उन्होंने कहा कि गुरु छल, कपट और मोह से मुक्त कर आत्मज्ञान का प्रकाश जगाते हैं।
उन्होंने “गुरु” शब्द का आध्यात्मिक अर्थ बताते हुए कहा कि ‘ग’ अर्थात गंभीरता, ‘उ’ अर्थात उदारक, ‘र’ अर्थात रहस्य और ‘उ’ अर्थात उद्धारक। जो आत्मा के भीतर छिपे रहस्यों का उद्घाटन कर जीव का उद्धार करें, वही सच्चे गुरु हैं।
गुरुमाँ ने गुरुपूर्णिमा के इतिहास का उल्लेख करते हुए बताया कि इसी पावन दिवस पर इन्द्रभूति गौतम को भगवान महावीर स्वामी जैसे सद्गुरु की प्राप्ति हुई थी। भगवान महावीर को केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद भी उनकी दिव्यध्वनि तब तक प्रकट नहीं हुई, जब तक उसे ग्रहण करने वाला योग्य पात्र नहीं मिला। जब इन्द्रभूति गौतम समवसरण पहुँचे और भगवान के दर्शन किए, तो उनका अहंकार समाप्त हो गया और वे भगवान के प्रथम गणधर बन गए। तभी भगवान की दिव्यध्वनि प्रवाहित हुई।
प्रवचन के दौरान गुरुमाँ ने समाज को आत्ममंथन का संदेश देते हुए कहा कि आज लोगों के पास परिवार, मनोरंजन और अन्य कार्यों के लिए समय है, लेकिन धर्मसभा में आने और धर्म की रक्षा के लिए समय नहीं है। उन्होंने कहा कि संतों के भवन दानदाताओं की श्रद्धा से बने हैं, इसलिए वहाँ नाम, प्रसिद्धि या फोटो की भावना से नहीं, बल्कि सच्चे भक्त बनकर आना चाहिए।
उन्होंने सभी मतभेद भुलाकर जैन समाज को एकजुट होने का आह्वान करते हुए कहा कि प्रत्येक जैन परिवार की धर्मसभा में सहभागिता आवश्यक है। यदि आज की पीढ़ी धर्म की रक्षा नहीं करेगी, तो आने वाली पीढ़ियों से इसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती।
अपने प्रवचन के समापन पर गुरुमाँ ने कहा कि श्रद्धा से शीश केवल अरिहंत भगवान के चरणों में ही झुकना चाहिए। उन्होंने कहा, “देव तो अरिहंत ही हैं, यही सत्य है। गुरु भी अरिहंत ही हैं, यही सत्य है। जिनदेव और अरिहंत भगवान की वंदना जीवन में कभी नहीं भूलनी चाहिए।”
उन्होंने कहा कि सच्चे गुरु की दिव्य शक्ति मनुष्य को अज्ञान और अंधकार से निकालकर आत्मा के साक्षात्कार की ओर ले जाती है। गुरुपूर्णिमा का वास्तविक संदेश भी यही है कि गुरु के मार्गदर्शन में आत्मकल्याण और आत्मज्ञान की यात्रा को अपनाया जाए।
जय हो गुरुपूर्णिमा महापर्व!

