दून पुस्तकालय में गढ़वाली कहानियों के अनुवाद की पुस्तक पनाळ का लोकार्पण
कार्यक्रम की अध्यक्षता सुपरिचित कवि व समालोचक राजेश सकलानी ने किया

देहरादून 02 अप्रैल।
गुरुवार को दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से साहित्यकार कान्ता घिल्डियाल द्वारा चयनित गढ़वाली कहानियों के अनुवाद की पहली पुस्तक ‘पनाळ’ का लोकार्पण किया गया. लोकार्पण के बाद मंचासीन अतिथि वक्ताओं द्वारा पुस्तक पर चर्चा भी की गई.
कार्यक्रम की अध्यक्षता सुपरिचित कवि व समालोचक राजेश सकलानी ने किया. इसमें अतिथि वक्ता के तौर पर गढ़वाली साहित्यकार मदन मोहन डुकलाण, हे. न. बहुगुणा केन्द्रीय गढ़वाल विवि में कला निष्पादन व रंगमच विभाग के निदेशक गणेश खुगशाल ‘गणी’ रंगकर्मी कर्नल मदन मोहन कण्डवाल व साहित्यकार कांता घिल्डियाल मौजूद रहे. कार्यक्रम का संचालन कवयित्री बीना बेंजवाल ने किया.
दून पुस्तकालय के सभागार में चयनित मौलिक गढ़वाली कहानियों के अनुवाद की पहली पुस्तक पनाळ का लोकार्पण समारोह पूर्वक किया गया। पुस्तक का लोकार्पण साहित्यकार राजेश सकलानी, मदन मोहन डुकलाण, गणेश खुगशाल ‘गणी’ व मदन मोहन कण्डवाल द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संचालन बीना बेंजवाल ने किया।
कथा संग्रह पनाळ में गढ़वाली कथा साहित्य के मूर्धन्य लेखक सदानंद कुकरेती, विद्यावती डोभाल, रमा प्रसाद धिल्डियाल ‘पहाड़ी’, डाॅ. महावीर प्रसाद गैरोला, भगवती प्रसाद जोशी ‘हिमवंतवासी’, गिरधारी लाल थपलियाल ‘कंकाल’, कन्हैया लाल डंडरियाल, सर्वेश्वर दत्त कांडपाल, सुमित्रा जुगलान, प्रताप शिखर, सुरेन्द्र पाल,, वीरेंद्र पंवार, निरंजन सुयाल, मदनमोहन डुकलाण, गजेन्द्र नौटियाल, ओमप्रकाश सेमवाल, महेशानंद, कुसुम नौटियाल, बीना बेंजवाल, कमल रावत, बलबीर राणा ‘अडिग’, व मंगलानंद की कहानियां शामिल हैं।
बता दें कि इन गढ़वाली कहानियों का हिन्दी अनुवाद कान्ता घिल्डियाल ने किया है। चर्चा के दौरान वक्ताओं ने कहा कि गढ़वाली कहानियों का पहली बार हिन्दी अनुवाद कर अनुवादक ने एक महत्वपूर्ण कार्य किया है। कहा गया कि इस किताब के प्रकाशन से पर्वतीय क्षेत्रों के समाज की सिथति, उनकी व्यथा कथा और जीवन सरोकार हिन्दी के विस्तृत पाठक वर्ग तक पहुंचेंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार राजेश सकलानी ने कहा कि लम्बे समय से पर्वतीय क्षेत्र की कहानियों के हिन्दी अनुवाद की आवश्यकता महसूस हो रही थी। मैंने इसके बारे में अनेक बार सोचा भी, लेकिन कान्ता ने यह कार्य कर एक मिशाल कायम कर दी है। अब यह बात हमेशा दोहरायी जाएगी कि पनाळ गढ़वाली कहानियों के अनुवाद की पहली पुस्तक है। संस्कृति निष्पादन केन्द्र गढ़वाल विवि के निदेशक गणेश खुगशाल गणी ने कहा कि इस किताब के माध्यम से गढ़वाल के समाज के सुख-दुख शेष दुनिया तक पहुंचेंगे। उन्होंने कहा कि हिन्दी में प्रकाशित होने से इन कहानियों की पहुंच अब हिन्दी के बड़े फलक में हो गई है।
प्रारम्भ में दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी ने सभी का स्वागत किया और मंचासीन अतिथियों का परिचय दिया। इस अवसर पर डॉ. डी. आर. पुरोहित, प्रेम साहिल, अरुण असफल, गजेन्द्र नौटियाल, ज्योतिष घिल्डियाल, जगदीश बाबला, सत्यानंद बडोनी, बी.सी. घिल्डियाल, कमला पंत, कुसुम भट्ट, विजय पाहवा,चन्द्रा सुयाल, ऊषा नौडियाल, सुंदर सिंह बिष्ट, मधन विष्ट, रमाकांत बेंजवाल,गणनाथ मनोडी, डॉ. लालता प्रसाद, वीरेन्द्र डंगवाल पार्थ, सोनिया गैरोला,कुसुम नौटियाल, सुंदर सिंह बिष्ट भगवान प्रसाद घिल्डियाल सहित अनेक साहित्यकार, भाषाविद और शोध छात्र, युवा पाठक व शहर के अन्य प्रबुद्ध जन उपस्थित रहे।


