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भागीदारी की शक्ति: भारत कैसे टीबी के खिलाफ बाज़ी पलट रहा है : जगत प्रकाश नड्डा

नई दिल्ली 23 मार्च। आज, जब भारत एक और टीबी मुक्त भारत अभियान – 100 दिनों की मुहिम शुरू कर रहा है, मैं तपेदिक (टीबी) को ख़त्म करने की हमारी यात्रा को अत्यधिक गर्व और नई उम्मीद के साथ देखता हूँ। हाल के वर्षों में, भारत की टीबी के खिलाफ प्रतिक्रिया अद्वितीय रही है, जो जन-भागीदारी पर आधारित है तथा जिसमें सन्माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के विज़न से प्रेरित सामूहिक जिम्मेदारी की भावना समाहित है। मिशन इंद्रधनुष जैसी प्रमुख पहलों की सफलता को बढ़ावा देकर तथा सामुदायिक स्तर पर ‘स्वस्थ नारी, सशक्त परिवार’ के संदेश को मजबूत करके, यह सम्पूर्ण समाज-आधारित दृष्टिकोण विभिन्न क्षेत्रों में अपनी ताकत साबित कर चुका है। दिसंबर 2024 में शुरू किए गए 100-दिन के गहन टीबी मुक्त भारत अभियान के अनुभव ने जन-शक्ति में हमारे विश्वास को और मजबूत किया है।
चिकित्सा अभियान के रूप में शुरू हुई यह मुहीम अब एक जन आंदोलन बन गयी है। परिणाम स्वयं बोलते हैं: भारत में 2015 से टीबी की घटनाओं में 21% की कमी दर्ज की गयी है – जो वैश्विक दर का लगभग दोगुना है – साथ ही टीबी मृत्यु दर में 25% की गिरावट आयी है। यह दिखाता है कि जब विज्ञान, प्रणाली और समाज साथ मिलकर काम करते हैं तो क्या हासिल किया जा सकता है।
आज भारत की तपेदिक के खिलाफ लड़ाई सामूहिक भागीदारी की ताकत को दर्शाती है। केंद्रीय मंत्रालयों से लेकर ग्राम पंचायतों तक, डॉक्टरों से लेकर जनप्रतिनिधियों तक, हर कोई शामिल है। यहां तक कि उपचार पूरा कर चुके मरीज भी टीबी विजेताओं के रूप में दूसरों का समर्थन कर रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय ने 25 अन्य मंत्रालयों , सभी पंचायती राज संस्थानों और सामुदायिक संगठनों की विशेषज्ञता, नेटवर्क और बुनियादी ढांचे को एकजुट करने के लिए उनके साथ हाथ मिलाया है।
“मेरा भारत” कार्यक्रम के माध्यम के युवाओं की उत्साहपूर्ण भागीदारी भी इतनी ही प्रेरणादायक रही है। 2 लाख से अधिक मेरा भारत स्वयंसेवकों ने टीबी मरीजों के लिए उपचार पालन और गरिमा बहाल करने हेतु मानसिक और सामाजिक समर्थन प्रदान करने के लिए पंजीकरण कराया है।
विज्ञान और नवाचार से प्रभाव
हमारी रणनीति नए साक्ष्यों और उभरती चुनौतियों के जवाब में लगातार विकसित हुई है। भारत के राष्ट्रीय टीबी प्रसार सर्वेक्षण से पता चला कि आधे मरीज सामान्य लक्षण नहीं दिखाते है, जिससे बगैर-लक्षण वाली संवेदनशील आबादी में सक्रिय जांच की ओर बदलाव हुआ। मौन मामलों से संक्रमण फैलता है – एक रोगी, जिसकी जांच नहीं हुई है, अनजाने में दूसरों को संक्रमण दे सकता है, जिससे प्रारंभिक जांच केवल आवश्यकता नहीं बल्कि नागरिक जिम्मेदारी भी बन जाती है।
एआई-सक्षम छोटी एक्स-रे मशीने और उन्नत आणविक परीक्षण की तकनीक से लैस निःक्षय वाहन, सबसे अधिक जोखिम वाले समुदायों को आसान जांच की सुविधा देती हैं। इस से अब तक 20 करोड़ से अधिक लोगों की जांच की गई, जिससे 32.65 लाख टीबी मामले पाए गए, जिनमें 10.9 लाख बगैर-लक्षण वाले मामले थे, जिनका अन्यथा निदान नहीं हो पाता।
इस गति को बनाये रखते हुए, हम टीबी मुक्त भारत अभियान के अगले 100 दिन के अभियान में 3,000 से अधिक एआई-संचालित छोटे एक्स-रे उपकरणों और अगले पीढ़ी के डायग्नोस्टिक मशीनों को तैनात किया जाएगा । जबकि डेटा-संचालित उपकरण उन उच्च-जोखिम गांवों और शहरी वार्डों की पहचान करने में मदद करेंगे, जहां लक्षित जांच का सबसे बड़ा प्रभाव पड़ सकता है।
भारत का तेजी से शहरीकरण हो रहा है। घनी आबादी और कमजोर समुदायों को देखते हुए, यदि जांच और देखभाल को मजबूत नहीं किया गया तो यह रोग अनजाने में फैल सकता है। इस लिए हम उच्च जोखिम वाले शहरी क्षेत्रों जैसे अनौपचारिक बस्तियों, प्रवासी श्रमिक समूहों और अन्य कमजोर आबादी पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
आगे का रास्ता
जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे हैं, हमारा कार्य स्पष्ट होता जा रहा है: हासिल की गयी गति को बनाए रखना और इसे और भी अधिक तेजी से आगे बढ़ाना है । भारत एक ऐसा राष्ट्र है, जब हम साथ मिलकर प्रयास करते हैं तो यह हमेशा सफल होता है। हमने पोलियो उन्मूलन के लिए एकजुट होकर कार्य किया। माननीय प्रधानमंत्री, श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में हमने कोविड-19 के खिलाफ रिकॉर्ड समय में एक बिलियन से अधिक लोगों का टीकाकरण किया। ‘मेड इन इंडिया’ विकास की रणनीति के साथ, हम आशा से निश्चितता की ओर बढ़े हैं। हम इस साझा मिशन में हर नागरिक, संस्था और युवा मंच को शामिल करके प्रारंभिक जांच को बढा़ना, निदान तक पहुंच का विस्तार करना और जन भागीदारी को विस्तार देना जारी रखेंगे।
टीबी के खिलाफ भारत का अभियान सिर्फ एक सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयास नहीं है। यह एक जन-सहभागिता है – उद्देश्य के लिए एकजुट होने की हमारे देश की क्षमता का प्रमाण है । यदि हम एक साथ है, तो हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि अगली पीढ़ी टीबी को केवल इतिहास के एक अध्याय के रूप में जानेगी, न कि उनके जीवन की वास्तविकता के रूप में। यही वह भारत है जिसके लिए हम काम कर रहे हैं। यही वह भारत है जिसे हम मिलकर बनाएंगे।
मुझे यकीन है कि हमारे सामूहिक प्रयासों से, हम अपने माननीय प्रधान मंत्री द्वारा निर्धारित संकल्प “हाँ, हम टीबी को समाप्त कर सकते हैं” प्राप्त करेंगे।
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(लेखक केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री एवं रसायन और उर्वरक मंत्री हैं।)

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