नवगीत पर वैचारिक संगोष्ठी का आयोजन
देहरादून 6 फरवरी 2026 । “नवगीत पर चर्चा” हेतु एक वैचारिक संगोष्ठी का आयोजन वरिष्ठ गीतकार शिव मोहन सिंह के द्वारा उनके निज निवास स्थान देहरादून पर किया गया। जिसकी अध्यक्षता नवगीत के शीर्ष रचनाकार असीम शुक्ल ने की। गोष्ठी का संचालन स्वयं शिव मोहन सिंह के द्वारा किया गया।
सर्वप्रथम अध्यक्ष असीम शुक्ल तथा सम्मानित कवि गण द्वारा माँ सरस्वती की तस्वीर के समक्ष दीप प्रज्वलित किया गया तथा कवयित्री अर्चना झा ‘सरित’ ने माँ वाणी की सुन्दर वंदना कर माँ को विराजित किया। इसके बाद श्रीमती निर्मला सिंह द्वारा सभी आमंत्रित गीतकारों को अंग वस्त्र तथा माला पहना कर स्वागत सत्कार किया गया। तत्पश्चात कवि कवयित्रियों द्वारा नवगीत पर परिचर्चा का दौर चला। रचनाकारों ने नवगीत सृजन पर सार्थक चर्चा कर अपने-अपने विचार प्रकट किए एवं अपनी गीत-प्रस्तुति भी दी।
वरिष्ठ गीतकार शिवमोहन सिं ने अपने संबोधन में कहा कि नवगीत गीत का ही विकसित और परिष्कृत रूप है जो यथार्थ के धरातल पर अपने नयेपन व मोहक स्वरूप के कारण विशेष आकर्षण पैदा करता है। नवगीत को गीत से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। आपने राजेंद्र प्रसाद सिंह, डॉ शंभू नाथ सिंह से लेकर माहेश्वर तिवारी, असीम शुक्ल तक कई नवगीतकारों का उल्लेख करते हुए नवगीत की यात्रा पर भी प्रकाश डाला।
सत्य प्रकाश शर्मा ‘सत्य’ जी ने कहा कि आँचलिक भाषा और बिंबों से सुसज्जित यथार्थ की अभिव्यक्ति ही नवगीत है।
मणि अग्रवाल “मणिका” जी ने कुछ इस तरह नवगीत को परिभाषित किया- वह गीत जो जीवन के यथार्थ की विशेषताओं व वर्तमान समय की विद्रूपताओं को जन चेतना के धरातल पर नवीन, सटीक व प्रभावी बिंबों से अपने कलेवर में कलात्मक रूप समाविष्ट करता है, नवगीत है।
नीरू गुप्ता जी ने भी अलग बिंबों व प्रतीकों के नयेपन के साथ लिखे गये गीत को नवगीत बताया।
अर्चना झा ‘सरित’ ने भी नवगीत में नयेपन का समर्थन करते हुए मार्गदर्शन की अपेक्षा की।
‘नवगीत के पुरोधा’ कहे जाने वाले आ. श्री असीम शुक्ल जी ने सभी गीतकारों के विचारों को न केवल ध्यान से सुना बल्कि अपने वक्तव्य द्वारा नवगीत की विधा ,शैली एवं उसके उद्भव पर प्रकाश भी डाला। आपने कहा कि भले ही राजेन्द्र प्रसाद सिंह नवगीत के सूत्रधार माने जाते हैं किंतु सर्वप्रथम नवगीत वीरेंद्र मिश्र जी के द्वारा लिखे गये। वे स्वयं इसके साक्षी हैं। उन्होंने 1947 में लिखे गये वीरेंद्र मिश्र जी के कुछ गीतों का जिक्र भी किया । उन्होंने मणि अग्रवाल मणिका की टिप्पणी का उल्लेख करते हुए यह भी कहा कि आज की परिचर्चा के बाद उनकी यह धारणा टूट गयी है कि महिलाएँ अक्सर सृजन से पूर्व उस विषय का समुचित ज्ञान प्राप्त नहीं करतीं।
आपने सबके प्रश्नों के यथोचित उत्तर देकर नवगीतकारों की उत्सुकता को भी शांत किया। साथ ही अपने नवगीतों से सभी को निःशब्द कर दिया। सुंदर एवं सार्थक परिचर्चा ने सभी गीतकारों की जिज्ञासाओं को तृप्त किया।
परिचर्चा में प्रतिभाग करने वाले वरिष्ठ गीतकार रहे आ.श्री शिव मोहन सिंह ,श्री सत्य प्रकाश शर्मा ‘सत्य’ , श्री जसवीर सिंह 

हलधर, श्री शादाब अली, सुश्री मणि अग्रवाल ‘मणिका’, सुश्री नीरू गुप्ता ‘मोहिनी’ सुश्री अर्चना झा ‘सारित’, तथा सुश्री शोभा पाराशर। राष्ट्रीय कवि संगम के क्षेत्रीय महामंत्री वरिष्ठ कवि श्री श्रीकांत ‘श्री’ जी ने भी कार्यक्रम में पधार कर गरिमा प्रदान की।
अंत में श्रीमती निर्मला सिंह जी ने आमंत्रित अतिथि-गण का आतिथ्य सत्कार चाय-नाश्ते के साथ किया।
साहित्य के संवर्द्धन के लिए समय- समय पर ऐसी संगोष्ठी का आयोजन होते रहना चाहिए। इस विचार के साथ गोष्ठी अपनी पूर्णता को प्राप्त हुई। # अर्चना झा ‘सरित’, देहरादून