वन भूमि पर बसे लोगों के हित में विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की मांग,यशपाल आर्य ने मुख्यमंत्री धामी को लिखा पत्र, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर जताई चिंता
देहरादून 05 जनवरी 2026 ।ऋषिकेश के पशुलोक एवं उससे लगे क्षेत्रों की 2866 एकड़ भूमि के मामले में 22 दिसंबर 2025 को माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों के बाद प्रदेशभर में वन भूमि पर निवासरत हजारों परिवारों में गहरी चिंता और असमंजस का माहौल बन गया है। इस विषय को लेकर वरिष्ठ कांग्रेस नेता एवं पूर्व मंत्री यशपाल आर्य ने माननीय मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पत्र लिखकर उत्तराखंड विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की मांग की है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों से बढ़ी चिंता
पत्र में यशपाल आर्य ने उल्लेख किया है कि सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य सचिव उत्तराखंड और मुख्य वन संरक्षक को प्रश्नगत भूमि की जांच के लिए समिति गठित करने के निर्देश दिए हैं। यह भूमि वर्ष 1952 के आसपास महात्मा गांधी की शिष्या मीरा बेन को लीज पर दी गई थी, जहां उन्होंने पशुलोक सेवा समिति के माध्यम से पशुपालन और पशु संवर्धन का कार्य प्रारंभ किया।
उन्होंने कहा कि पशुलोक के साथ-साथ इस क्षेत्र में वर्षों से लोगों का बसना होता रहा है। इसी भूमि पर एम्स ऋषिकेश, आईडीपीएल, पशुलोक जैसे सरकारी प्रतिष्ठान स्थापित हुए और बड़ी संख्या में टिहरी विस्थापितों का पुनर्वास भी किया गया।
हजारों परिवारों में भय और अस्थिरता
यशपाल आर्य ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जांच समितियों, पुलिस बल और वन विभाग की जबरन कार्रवाई से क्षेत्र में तनाव का माहौल बन गया है। दशकों से रह रहे लोगों में अफरा-तफरी और भय व्याप्त है, जो कानून-व्यवस्था की दृष्टि से भी चिंताजनक है।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड का 65 प्रतिशत से अधिक भूभाग वन क्षेत्र है और राज्य के पर्वतीय, भाबर, तराई व मैदानी इलाकों में लाखों लोग पीढ़ियों से वन भूमि पर निवासरत या वनों पर आश्रित हैं।
वनाधिकार कानून 2006 का नहीं हुआ समुचित क्रियान्वयन
यशपाल आर्य ने पत्र में कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने वन भूमि पर वर्षों से रह रहे लोगों को अधिकार देने के लिए वनाधिकार अधिनियम 2006 लागू किया था। देश के कई राज्यों ने इस कानून के तहत लाखों लोगों को अधिकार दिए, लेकिन उत्तराखंड में इसका अत्यंत सीमित उपयोग हुआ, जिसके चलते आज भी पीढ़ियों से रह रहे लोगों को कब्जेदार माना जा रहा है।
प्रदेशभर से दिए उदाहरण
उन्होंने रामनगर विधानसभा के मालधन चौड़ सहित 31 वन ग्राम, गौलापार का बागजाला गांव, हल्द्वानी का दमुवाढुंगा क्षेत्र, नैनीताल का बिंदुखत्ता, पिंडर घाटी, पैठाणी का मंजवी गांव सहित अनेक उदाहरण देते हुए कहा कि सैकड़ों वर्षों से बसे गांवों को वन भूमि से हटाने के नोटिस दिए जा रहे हैं।
विशेष रूप से बिंदुखत्ता का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि वहां के लोगों के पास 1932 से पशुचारण की अनुमति है और वन अधिकार समिति द्वारा 19 जून 2024 को उसे राजस्व ग्राम बनाने की संस्तुति भी की जा चुकी है, बावजूद इसके अब तक कोई निर्णय नहीं लिया गया।
वन विभाग की एकतरफा कार्रवाई की आशंका
यशपाल आर्य ने आशंका जताई कि हालिया न्यायालयी आदेशों की आड़ में वन विभाग एकतरफा कार्रवाई कर सकता है, जिससे हजारों परिवार उजड़ सकते हैं। उन्होंने चेताया कि यह स्थिति राज्य में सामाजिक अशांति और संघर्ष को जन्म दे सकती है।
विधानसभा ही है समाधान का मंच
पत्र में कहा गया है कि वन भूमि पर बसे लोगों के अधिकार, उनकी विवशता और वनाधिकार कानून से जुड़े मुद्दों पर व्यापक और सार्थक चर्चा केवल विधानसभा में ही संभव है, क्योंकि राज्य के लगभग हर विधायक के क्षेत्र में ऐसे मामले मौजूद हैं।
विशेष सत्र बुलाने की मांग
यशपाल आर्य ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि वन भूमि पर निवासरत हजारों परिवारों के हितों की रक्षा के लिए उत्तराखंड विधानसभा का विशेष सत्र अतिशीघ्र आहूत किया जाए, ताकि किसी वैधानिक और स्थायी समाधान तक पहुंचा जा सके।