उत्तम शौच का अर्थ है की अति श्रेष्ठ विचार धारा रखें: अनुपम मुनि

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देहरादून 03 सितंबर गुरु प्रेमसुख धाम में अपने विचारों की अभिव्यक्ति देते हुए जैन लोकमान्य संत स्थानकवासी श्री अनुपम मुनि जी महाराज ने कहा कि आज उत्तम शौच है यह संतों का मुनियों का और साधुओं का दस लक्षण का चौथा धर्म है किसानों महात्मा फकीर यती सती और आम आदमी सभी को दृष्टि से उत्तम शौच का धनी होना चाहिए। उत्तम शौच का मतलब है की अति श्रेष्ठ विचार धारा रखें। श्रेष्ठ विचारधारा से अर्थ है की संतो के संदर्भ में विचार करते हुए सोचे कि आत्मा ही श्रेष्ठ है आत्मा ही बढ़िया है आत्मा अविनाशी है आत्मा शाश्वत है आत्मा सनातन हैं आत्मा का सदैव अस्तित्व है आत्मा का रंग नहीं, आकार नहीं प्रकार नहीं और आत्म चेतना वाहन हैं आत्मा की चेतनत्व कभी खत्म नहीं हो सकता चाहे आत्मा गर्भावस्था में रहे और चाहे आत्मा कर्म अवस्था रहे या मोक्ष में रहे तो भी उसका चेतनात्व धर्म नष्ट नहीं होता ।इसीलिए साधु को यही चिंतन और मनन सदैव करना चाहिए कि मेरा शरीर क्षणभंगुर है कभी भी छूट सकता है कभी टूट सकता है कभी भी आत्मा शरीर से पृथक हो सकता है और जो नश्वर है और जो छूटने वाला है और जो आत्मा से परे है उसको अपना नहीं मानना और उसे आत्मा नहीं मानना क्योंकि कुछ संसार में लोग ऐसे हैं आत्मा और शरीर को एक मानते हैं क्योंकि शरीर में आत्मा का वास है और आत्मा शरीर के संरक्षण में रह रही है आत्मा शरीर के पिंजरे में हैं और इसके साथ 10 प्राण हैं इसीलिए ऐसा मालूम पड़ता है कि आत्मा और शरीर एक है क्योंकि उसी शरीर में मन है इसी शरीर में कान है इसी शरीर में आंख है इसी शरीर में नाक है और इसी शरीर में जिव्हा है और इसी शरीर में वाणी हैं इसी शरीर में तन है और इसी शरीर की आयु है यह सब कुछ जब बलवान होते हैं तो शरीर जिंदा रहता है और प्राण समाप्त होते हैं शरीर गलता और विध्वंस होता है खत्म हो जाता है तो इसीलिए संसारी मनुष्य को यह मालूम पड़ता है के शरीर और आत्मा एक ही है जबकि ऐसा नहीं है शरीर अलग है आत्मा अलग है आत्मा सारस्वत है शरीर नश्वर है आत्मा अविनाशी है शरीर नाशवान है शरीर का विध्वंस होगा आत्मा का कभी भी विध्वंस से नहीं होता आत्मा कहीं भी रहे किसी भी रूप रंग रूप में रहे किसी भी अवस्था में रहे सदैव सदैव वह चैतन्य से ली होगी इसीलिए वह अविनाशी और कर्मों से मुक्त होने पर भी तेजस कारण शरीर से मुक्त होने पर भी आत्मा सदैव सारस्वत था शाश्वत है और शासक सदा रहेगी इसीलिए हमें आत्मबोध को प्राप्त होना चाहिए आत्मबोध प्राप्त करना ही उत्तम शौच है साधुओं के धर्म में उत्तम शौच च भी है साधु सदैव यही चिंतन करें यही बंद करें और किसी का ही ध्यान करें कि मैं अकेला हूं मेरी आत्मा अकेली है मैं शाश्वत हूं मैं किसी से नहीं बधा हम सो सोहम मैं वह हूं वह मैं हूं वह माने आत्मा और मैं माने भी आत्मा जो भी कुछ हूं वह मैं हूं मैं अर्थात आत्मा ऋषि का चिंतन इसी का मनन करने हैं उत्तम शौच है क्योंकि हमारा जो शरीर है आज सूचियों से भरा हुआ है शरीर पर चिंतन करते हैं क्योंकि शरीर सप्त धातु से बना है खून रक्त अस्थि मज्जा बसा वात पित्त कफ आदि से निर्मित है शरीर और इसी के साथ हजारों लाखों नशे से जुड़ा हुआ है इसीलिए इसे अस्थि पंजर भी कहा जाता है कहा जाता है और इस शरीर के अंदर जो हम खाते हैं मल मूत्र बनता है हड्डी चर्बी बनती है बाल रोम बनते हैं कब बनता है बात भी बनता है पीत भी बनता है इस प्रकार से सभी चीजेपुद्गलिकू है पुद्गलिक वस्तु नाशवान होता है इसी का चिंतन मनन करना साधु का या आध्यात्मिक साधक का चौथा धर्म है संतो के पर्व में चौथा पर्व है उत्तम श्रेष्ठ शौच है